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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

इंसान के खूँ की नहीं

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'

इंसान के खूँ की नहीं प्यासी कभी इंसानियत, पर भूल जाते चूर मद में नर यही इंसानियत। सकते न जो दे जिंदगी क्या हक़ उन्हें लेने का फिर, पर खून बहता ही रहा, रोती रही इंसानियत। बौछार करते गोलियों की भीड़ पर आतंकी जब, उस भीड़ की दहशत में तब सिसकारती इंसानियत। हे जालिमों जब जुल्म अबलों पर करो खूँखार बन, मजलूम की आहों में दम को तोड़ती इंसानियत। थक जाओगे आतंकियों तुम जुल्म से कहता 'नमन', आतंक के आगे न झुकना जानती इंसानियत।


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