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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

सुशील यादव के दोहे

एक जमूरा पीटता,खूब फटे तक ढोल मुँह से पर निकले नहीं ,ढाई आखर बोल ## खोलो मन की खिड़कियां ,दरवाजे भी खोल प्रजातन्त्र में छूट है ,जो चाहे सो बोल ## मन को अपने मैं रखूं ,कहाँ-कहाँ मौजूद ये किस जनम उधार का ,रोज चढ़े है सूद ## कथनी-करनी है नहीं,व्यापक कहीं प्रचार हर बन्दर के हाथ मे,अदरक दिखे अचार इस चुनाव मैदान में ,उतरे लोग अपार सीधे-सादे हैं विरल,गिनती के दो-चार ## कोई अपनी औकात का,भूला भूत तमाम इसीलिए तो कर रहा,उल्टे- सीधे काम ## तेरे मन पर नित कहीं ,डाल रहा है डोर चिकनी चुपड़ी बात पर,पड़ना मत कमजोर ## जाते-जाते राज यूं , बतला गया नवाब कांव-कांव केवल कहे, काके काक कबाब ## दूभर है कहना अभी ,लाज-शर्म की बात होली पर उनकी चले ,अपनी क्या औकात ## होली के छींटे:: ## लाख मनाओ दिल मगर, रहता डांवा डोल अनबन सभी बता दिया ,पीट -पीट के ढोल होली के छींटे ## मेरे गाल लगा गया , प्रीतम गहरा रंग उसकी बंशी तान में ,हो ली उसके संग बन्द करोगे आप जब ,दारु की दूकान मतदाता की आपसे ,होगी कुछ पहचान ## मतदाता मेरे कहीं ,रखना इतना ख्याल घटिया जुमलों की फसल,बोता दिखे न लाल मालूम चोर जब हुआ,हमको चौकीदार रातों को हम जागते ,सोयें कब सरकार मन से गर प्रहलाद को,देना है सम्मान अबकी बस्ती होलिका ,रूप जले अनुमान ## भारी भरकम जीत का ,कैसे लगे कयास मन तकली उम्मीद में ,उलझा सूत कपास ## वन वासी मैं राम हूँ,पंचवटी का ज्ञान कंकर-पत्थर क्या चुभे,तँम्बू महल समान ## धरती उर्वर डालिये,अच्छा उत्तम बीज गौरव के फिर बाटना ,सदाचार ताबीज ## बीते-गुजरे साल ने,ऐसा किया कमाल धोती उनकी यूँ फटी, मोल बिका रूमाल ## बुढापा ... ## वो दिन सभी हवा हुए ,सुख थे जहां सवार कातर दुःख अब सामने , लम्बी दिखे कतार अपनी सुविधा से सभी,लगा रहे अनुमान अचरज तुलसी को लगे ,कौन जात हनुमान ## हल्के हमको ले रहे,हैं हम भारी चीज समय अभी है आपका,सीखो अदब तमीज ## जाते जाते दे गया, साल गया उपहार कर्ज मुक्ति की बात ये ,कृषको पर उपकार ## नए साल में आपका,कैसा हो व्यवहार जीत-जीत पहना करो ,खुद मन -माफिक हार ## अहो सफलता चाबियां ,हाथ लगी जो देर उड़े नही उपहास में ,तीतर और बटेर ## गर्व भरे अभिमान का ,कैसा चकनाचूर ज्ञान अकारथ हो गया, लक्ष्य हुआ अब दूर ## जिसके घर मे जल गया ,प्रेम अगन पुरज़ोर उनको अगहन -पूस की ,ठंड लगे कमजोर ## राजे गई रमन गया ,डूबा शिव का राज गौरव सभी झपट लिया,अहंकार का बाज ## मेरे भीतर मर गया, पढ़ा-लिखा इंसान । नेता जबसे बांटते,गली-गली में ज्ञान ।। ## एक दन्त की हो कृपा ,वक्रतुण्ड की सीख समझो पाया दान में ,मन वांछित वो भीख ## गणपति मेरे घर अभी ,जब हैं विराजमान सुख-वैभव सब पास में,दूर हुआ अभिमान # ## बनी नहीं जब योजना ,होता कहाँ विकास मिलजुल के सब काटते, मतलब की बस घास ### विकास : छिपा दूर बैठा अलग ,दिखे फटे जो हाल होय भले अरबो धनी ,मन से है कंगाल ### छल प्रपंच की बाढ़ में ,मेरी डूबी नाव एक मिले प्रभु आसरा,शायद होय बचाव ## ## अब के बिछुड़े जो मिलें ,ऐसा हो सदभाव खिंचे -खिंचे से ना रहें ,मन से लगे खिंचाव ## अब के बिछुड़े जो मिलें ,ऐसा हो सदभाव खिंचे -खिंचे से ना रहें ,मन से लगे खिंचाव मन्दिर बनवा राम का ,हृदय बसा लो राम एक तीर से हो सके ,शायद दो-दो काम ## सूने घर में बुन गया , मकड़ी जैसा जाल एक तुम्हारी याद ने , जीना किया मुहाल ## इस बारिश में काम की , छतरी लेना खोल अनबन मौसम ना कभी , भीगे दिल अनमोल ## सुख की चादर तान के,सोये रहते आप समय मिले तो ढूढ लो ,आस्तीन के सांप ## पैसे वालों ने किया ,अबला से दुष्कर्म फांसी चढे गरीब ही ,उन्हें सजा है नर्म जाने क्या- क्या ढूंढती , ये निगाह कमजोर। साजन तो इस पार है, मौसम है किस ओर ।। ## छोटा अब लगने लगा ,रोटी का अनुपात आश्वासन की बेड़ियाँ ,नियमित शाम-प्रभात ## बारिश में अब भीगना ,होता है हर रोज डूबी अपनी नाव कब ,किधर करें हम खोज ## टोपी थी बे नाप की ,भगवा रंग अभाव बीचो- बीच पहन सभा ,दिखलाते क्या भाव ## जी को अपने खोल कर ,दिखलाओ जी आज बिगड़ी-बनती योजना ,बन्दर बाँट समाज ##


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