मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

नदियाँ
( सार छंद)

महेन्द्र देवांगन माटी

कलकल करती नदियाँ बहती, झरझर करते झरने । मिल जाती हैं सागर तट में, लिये लक्ष्य को अपने ।। सबकी प्यास बुझाती नदियाँ, मीठे पानी देती । सेवा करती प्रेम भाव से, कभी नहीं कुछ लेती ।। खेतों में वह पानी देती, फसलें खूब उगाते । उगती है भरपूर फसल तब, हर्षित सब हो जाते ।। स्वच्छ रखो सब नदियाँ जल को, जीवन हमको देती । विश्व टिका है इसके दम पर, करते हैं सब खेती ।। गंगा यमुना सरस्वती की, निर्मल है यह धारा । भारत माँ की चरणें धोती, यह पहचान हमारा ।। विश्व गगन में अपना झंडा, हरदम हैं लहराते । माटी की सौंधी खुशबू को, सारे जग फैलाते ।। शत शत वंदन इस माटी को, इस पर ही बलि जाऊँ । पावन इसके रज कण को मैं, माथे तिलक लगाऊँ ।।


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें