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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

लकड़ी के पुल पर से गुजरती जिंदगी

लेखक: श्री वीनेश अंताणी
अनुवादक: डॉ.रजनीकान्त एस.शाह

अमरिकी लेखिका मेडिलीन लेंगल कहती हैं: `मैं कईंबार अपनी उम्र के विविध तबकों में खुद को रखकर देखने का प्रयत्न करती हूँ। मेरे मन में जो स्मृति जगती है, उसे मैं भूतकाल में सोचती नहीं हूँ परंतु वह सब मानों उसी वक्त घट रहा हो ऐसे वर्तमानकाल में अनुभव करने का प्रयत्न करती हूँ। मैं बड़ी हुई उन सभी घर,गलियों और गाँव में खुद को देखती हूँ। जिनके बीच रहकर बड़ी-पली वे मेरे माता-पिता,भाई-बहन,मित्र,शिक्षक,सहपाठी,पड़ोसी,दुकानदार आदि को स्मृति से बाहर निकालकर उनके साथ जीने लगती हूँ। उम्र के विविध तबकों में उत्पन्न हुई परिस्थितियाँ,उस वक्त की कडवी-मीठी घटनाएँ,स्वीकार और अवहेलना के प्रसंगों के साथ प्रेम,नफरत,विरोध,गुस्सा,विनोद –यह सारा मानो तादृश हो उठता है। संभव है,कि ऐसा खेल खेलकर मैं व्यक्ति के रूप में अपने विकास के ग्राफ को समझने की कोशिश कर रही होऊँ।’

खेल के रूप में यह कल्पना रोमहर्षण लगती है परंतु हकीकत में हम बीते हुए समय में सदेह वापस नहीं लौट सकते। किशोर साहित्य की लेखिका गेईल कार्सन लेपिन के कथनानुसार उम्र के एक तबके और दूसरे तबके के बीच लकड़ी का पुल होता है। उस पुल के पिछले छोर पर बीती हुई उम्र होती है और सामनेवाले छोर पर अनसुलझी हुई पहेली जैसा भविष्य होता है। हम उस पुल पर चलते हुए जैसे जैसे आगे बढ़ते हैं वैसे वैसे पीछे छूटा हुआ छोर टूटता जाता है। उस पर से वापस लौटने की संभावना नहीं रहती।

उम्र के हरेक तबके का अलग ही मजा है और सवाल भी अलग अलग हैं। बच्चे शायद ही भविष्य का विचार करते हैं। इसलिए वे निर्दोष और चिंतारहित निजानन्द में मस्त रह सकते हैं। चिंतकों का कहना है,कि हम जिस समय भविष्य के बारे में सोचना शुरू कर देते हैं तब से हमारा बचपन अदृश्य हो जाता है। बचपन ही एकमात्र ऐसा तबका है,जिसमें बालक को सब पर और सभी बाबतों पर अंधा भरोसा होता है। वह माता-पिता की उंगली थामता है तब उसे पता होता है,कि वह सुरक्षित है। शैशव की देहली पारकर बाहर की दुनिया में पाँव धरते ही निर्दोष आनंद और भरोसा खतरे में पड जाता है,आशंका,धिक्कारभाव और असुरक्षा का भाव उसे घेर लेता है। जैसे जैसे बड़े होते जाते हैं वैसे वैसे इस यथार्थ के साथ मेल जमाने में मुश्किलें बढ़ती जाती हैं।

तरुणावस्था के तो अनेक प्रश्न होते हैं। शारीरिक परिवर्तन के साथ साथ विचारों और चित्ततंत्र में भांति भांति की उथलपुथल होने लगती है। इस उम्र में व्यक्ति प्रेम,आकांक्षा और स्वतन्त्रता के ख़यालों को अलग दृष्टिकोण से समझने का प्रयत्न करता है। बंधनों से मुक्त होने के प्रयत्नों में ही वह नये बंधनों से घिरे हुए जवानी और प्रौढ़ावस्था के दौर में पहुँच जाता है। प्रौढ़ावस्था के अरण्य से गुजरते हुए व्यक्ति जिम्मेदारियों का भार वहाँ करते करते थक जाता है। ठीक से समझा जा सके तो वृद्धावस्था जिंदगी की सारी थकावट उतारने का तबका बन सकता है। इस उम्र में हम नये प्रकार के बाल्यकाल का आनंद भी मना सकते हैं।

कइयों की उम्र हयाती के वर्षों की गणना के अनुसार बड़ी होती है परंतु वे मानसिक रूप से छोटे ही रहते हैं। इसके लिए अभ्यासी `सबजेक्टिव एज’ शब्द प्रयोग करते हैं। `सबजेक्टिव एज’ अर्थात् व्यक्तिलक्षी अवस्था। कोई व्यक्ति विचार,वर्तन,समझदारी,सम्वेदनशीलता,दृष्टिकोण इत्यादि से परिपक्व हुआ है या नहीं,यह भी देखना पड़ता है। कईं युवा मानसिक रूप से वृदध होते हैं,जबकि कुछ वृद्ध जीवन के प्रति अभिगम के कारण मानसिक रूप से जवान रहते हैं।

इस्वी सन 1868 में प्रकाशित लूइसा मे ओलकाट के उपन्यास `लिटल विमेन’ में एक संवाद है: `मेरा समय परिपक्व नहीं हो तब तक मुझे अवस्था में बड़ा करने का प्रयत्न छोड़ दो।’ यहाँ आवश्यक मानसिक विकास हो उसके बाद ही उम्र के नये तबके में प्रविष्ट होने के लिए लकड़ी के पुल पर पाँव रखने की चितावनी का सूर सुनाई देता है।


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