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वर्ष: 2, अंक 36, मई(प्रथम), 2018



पर्यावरण


रंजन कुमार प्रसाद


 

चल रहे हम किधर
खुद ही नहीं पता है
मानव विनाशलीला
खुद ही खोद रहा है।

चलती है मेरी नैया
डुलती है मेरी नैया
हम कहाँ बढ़ रहे है
खुद ही नहीं पता है
मानव...................

चलते है हम आगे
देखते नहीं हम पीछे
विकास के चक्कर में
खुद कब्र खोद रहा है
मानव...................

पर्यावरण की रक्षा
खुद कर नहीं रहा है
नीज तत्व की निशानी
खुद ही मिटा रहा है
मानव..................

ऐसा न हो भविष्य में
की सुख जाए पयोधि
न बरस पाए पयोधर
पयाम दे रहा है
मानव...................

वैश्विक स्तर पर बढ़ते
पर्यावरण में प्रदूषण
पृथ्वी वायुमंडल का
तापमान बढ़ रहा है
मानव.................

अपने ही स्वार्थ चलते
ये तप रही है दुनिया
ओजोन परत में भी
छेद हो रहा है
मानव...............

मानव अपनी मंगल में
काट रहा है जंगल
दुनिया को तो वह
शमसान बना रहा
मानव..............

वातावरण में खूब 
बढ़ रहा प्रदुषण
चैन से भी न मानव
साँस ले रहा है
मानव...........

अपनी ही सुख के चलते
परिविस्ट हुआ मानव
निज स्वार्थ में वह 
परिशुन्य हो रहा है
मानव विनाशलीला 
खुद ही खोद रहा है।

 

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