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वर्ष: 2, अंक 36, मई(प्रथम), 2018



पत्नि के लिये


पीताम्बर दास सराफ"रंक"


 


जीवन में इतने दिन तुम मेरे साथ रहीं
हर पग पर तुमने मेरी होकर साथ दिया
टूटू  न कहीं,बिखरूं न कहीं मैं जीवन में
यही सोच समझकर तुमने अपना काम किया।।१।।

मेरे जीवन में जब तुम आईं मैं समझा
शादी दस्तूर है जो निभाया अपनो ने
घर आनी थी इक दुल्हन तो वो तुम आईं
उस पर भी मैं तो खीज रहा था अपनों से।।२।।

वो तुम थीं जिसने प्यार किया साथी बनकर
मेंरी तकलीफों को समझा निकाला हल भी
मैं जब भी बैठा हार ,आँखे बंद कर के
तुमने आँखे खोली,बंधाया ढाढस भी।।३।।

बाहर की दुनियाँ से मैं जब जब भी भागा
तुमने मुझको खड़ा किया लड़ने दुनियाँ से
मुझमें हिम्मत और हौसला भरा पराक्रम का
फिर मैंने कभी न मानी हार इल्ज़ामों से।।४।।

तुम सारा जीवन लगी रही घर उत्थान मे
पीती रही आँसू जो मिले परिस्थितियों वश
कभी न मानी हार,न भागी कभी उद्वेलित हो
ऐसी खरी उतरी जीवन की कसौटी पर।।५।।

याद नहीं जीवन में क्या खोया क्या पाया
तुम बतला दो तुमको जो आभास हुआ हो
मैं क्षमाप्रार्थी याचक बन भीख मांगता हूँ
माफ करो ग़र मेरे कारण संत्रास हुआ हो।।६।।
 

 

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