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वर्ष: 2, अंक 36, मई(प्रथम), 2018



बच्चा


डॉ मधु पाराशर


 


हर माँ को  बच्चा एक नम्बर लगता है
माँ का आँचल धरती अम्बर लगता है

कितना भी बालक चंचल नटखट उधमी
माँ को बच्चा प्यारा अक्सर लगता है

वीराना हो जाता घर बिन बच्चों के
बच्चों से ही सुंदर सा घर लगता है 

हो ठीक न तबियत जब  छोटे से शिशु की
खो देती सब जैसे वो  दिलवर लगता है

पल पल में करता हो कूँदा फाँदी जब
  देखे जाने पर तो बन्दर लगता है

पढ़ लिख कर बन जाये शहजादे साहब
लहजा बच्चों का तो खंजर लगता है

सब कुछ छोड़़ यहाँ से जाता है मानव
तब भी करता  खेल कलन्दर लगता है



 

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