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वर्ष: 2, अंक 36, मई(प्रथम), 2018



अर्थ की बेमेल देहात्मा


किरण राजपुरोहित ‘नितिला’


 


हमारे समय के 
बेचैन होकर
उदास हुये शब्द
छटपटाने लगे हैं
सहा नहीं जाता उनसे
नये अनर्थों में ढ़लना
अपने रुप को यूं
निरंतर बिगड़ते देखना
उन शब्दों के संस्कार में नहीं है
यूं भाषा को छलना 
पीढ़ी को अनगढ़ गढ़ना
मंझे हुये अर्थ को भूलना
ठगे गये हैं समय के हाथों
उंगली पकड़ कर चले तो थे
पर कब आंखों पर पट्टी बांध
बरगला कर समय ने
इस पथ चला दिया 
सोचते कह पाते
फंस चुके थे इस युग के दलदल में
जहां शोर तो खूब मचाया जाता 
अच्छे बनने का 
कोसा जाता बुरे को
पर ठूंसे जाते रहे गलत अर्थ 
शब्दों की देह में
अर्थ की बेमेल देहात्मा 
भटकती है 
अपने अस्तित्व के लिये 
 

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