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वर्ष: 2, अंक 36, मई(प्रथम), 2018



ईश्वर से प्रश्न ???


कविता गुप्ता


 



उफ़ ! भीतर है अग्नि, बाहर भी लपटें,
धुआँ ही धुआँ, इस से कैसे हम निपटें ? 
बीज नफरत का कड़वा कहाँ से आया ?
ज़हरीली फसल ने हम सब को डराया। 

शांति आलोप हुई, अशांति का सम्राज्य,
तन नहीं वश में, मानी मन ने पराजय।  
मानव तेरी रचना का शिरोमणि चहेता ,
उसके ही हाथों 'निहत्थों' का कत्ल देखा। 

है बदले की भावना, वासना की दुर्गन्ध ,
सहमें हुए छुपाई फूल, कलियों ने सुगंध।  
अन्धेरा है ! जैसे सूर्य ने अन्तिम विदा ली, 
रूठ कर उसने अपनी नई नगरी बसा ली। 


 

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