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वर्ष: 2, अंक 36, मई(प्रथम), 2018



भीगा मन


कंचन अपराजिता


 

    
सूनी सी डगर पर 
सजे हुए गुलमोहर 
देख लगा ऐसा,
वे वक्त को वापस 
बुला रहे हैं
एक सोये प्रेम को जगा रहे है
हाँ, उस वक्त की याद 
दिला रहे हैं ।
जब हम तुम हँसते हुये
इसकी छाँव मे बैठ
एक दूसरे की
अापबीती सुनते थे।
भविष्य की कहानी 
बुनते थे।
नयनो की भाषा
पढ़ते थे।
यूँ तो नभ पर
मेघ का कतरा भी नही है
पर ये आँसू की बारिश  
जाने अनजाने
गुलमोहर के नींचे 
मुझे भींग रही है।



 

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