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वर्ष: 2, अंक 36, मई(प्रथम), 2018



मकबूल.....


कल्पना पाण्डेय


 


एक रोज़ उंगलियों के पोरों से खुरचे रंगों ने पूछा ...
हुसैन क्या तलाशते हो खाली कैनवास पर ?
क्या नहीं मिलता?
 और ....क्या रह जाता है हर बार 
माँ ढूंढता हूँ और वो हर बार औरत हो जाती है 
शायद मैं मकबूल होना चाहता हूँ
पर देखो ना हर बार फिदा हुआ जाता हूँ।
खुरचे रंग शरमाये...
 उड़े और...
हुसैन की दाढ़ी में छिप गए।
 

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