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वर्ष: 2, अंक 36, मई(प्रथम), 2018



चुभन


धर्मेन्द्र अहिरवार


 

 
मैं जीवन में कभी नही रोया हूँ
पर इन दिनों 
एक चुभन है जो बार बार उठ आती है 

ये चुभन तुम्हारे ख़यालों से उठती है 
ये चुभन तुम्हारी यादों से उठती है 
ये चुभन तुम्हारी बातों से उठती है 

ये बातें हमारे मौन की बातें हैं 
जो तुम्हारे कुछ कहे जाने में 
शेष बची रह जाती हैं 

मैं तो मौन की चादर ओढे बैठा हूँ 
जो तुम्हारा पहला तोहफ़ा थी 

तब से अब तक मैं मौन हूँ 
और मैं मौन रहकर ही 
तुम्हारी शेष बची हुई बातों का मौन सुनना चाहता हूँ 

मैं कहना चाहता हूँ की संभावनाएँ ख़त्म नहीं होतीं 
वे जन्मती हैं 
प्यार में, नफ़रत में और इंतज़ार में भी 

मैं रोऊंगा जी भरकर 
और हो सका तो तब तक 
जब तक मेरी आँखों से तुम्हारी यादें न सूख जाएँ 

मैं इन्ही संभावनाओं को लेकर 
स्मृतियों को घिसता रहूँगा
फिर भी अगर मेरा बीतना बचा रहा
तो मैं जियूँगा साथी...! 

 

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