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वर्ष: 2, अंक 36, मई(प्रथम), 2018



क्या करूँ ऐसे ईश्वर का?


डॉ० अनिल चड्डा


 
हे ईश्वर
तू क्यों
कुम्भकर्ण की भाँति
सोया हुआ है
इतने कुकृत्यों
इतने अत्याचारों से
शोषित
सताये हुए
लोगों की
आवाज सुन कर भी
क्यों नहीं
तेरी नींद टूटती
किन सपनों में
खोया है तू
क्या सोचता है
दुष्कर्मियों के अंदर से
कोई आवाज उठेगी
क्योंकि
सभी को यही भ्रम है
कि सभी के भीतर है
यदि ऐसा है
तो क्यों नहीं 
उनके जमीर को 
जगाता
क्यों नहीं 
उन्हें सही राह दिखाता
क्या उस दिन का
इंतजार है
जब जुल्म और पाप
हद से 
ज्यादा बढ़ जायेगा
और तू
अवतरित होगा
यह सिद्ध करने के लिये
कि मैं हूँ
तो फिर 
ऐसे ईश्वर का
मैं क्या करूँ
मेरे लिये
तू हुआ न हुआ
बराबर है

 

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