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वर्ष: 1, अंक 12, मई(प्रथम) 2017



सेल्फी

महेंद्र देवांगन

जिधर देखो उधर, सेल्फी ले रहे हैं ।
ओरिजनल का जमाना गया, 
बनावटी मुस्कान दे रहे हैं ।

भीड़ में भी आदमी आज अकेला है 
तभी तो बनावटी मुस्कान देता है ।
और जहाँ भीड़ दिखे वहाँ 
खुद मुस्करा कर सेल्फी लेता है ।

भीड़ में दिख गया कोई अच्छी सी लड़की 
तो आदमी पास चला जाता है ।
चुपके से सेल्फी लेकर 
अपने दोस्तों को दिखाता है ।

दिख गया कहीं जुलूस तो 
लोग आगे आ जाते हैं ।
और एक सेल्फी लेकर 
पता नही कहां गायब हो जाते हैं ।

खाते पीते उठते बैठते 
लोग सेल्फी ले रहे हैं ।
मैं समाज के अंदर हूँ 
ये बतलाने फेसबुक और 
वाटसप पर भेज रहे हैं ।

सच तो ये है 
आदमी कितना अकेला हो गया है ।
एक फोटो खींचने वाला भी 
नहीं मिल रहा 
इसीलिए तो सेल्फी ले रहा है ।

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