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वर्ष: 1, अंक 12, मई(प्रथम) 2017



माँ ! सन्तान को समर्पित !!

कविता गुप्ता

कोख में सुरक्षित, प्रसव पीड़ा सहना,
आँचल से अमृत, बनाए गोद पलना।  
असीम सहनशील, सहचरी कह सकते,
साया बन कर घूमे, भूल जाती थकना। 

लड़खड़ाते कदमों का सम्बल बन जाए,
नव प्रेरणा प्रतीक, सिखाए कैसे चलना ?
जिनको मिली यह पूँजी, हैं खुशनसीब,
असमय छिन न जाए, सम्भाल रखना। 
कुछ दूर....जा बसीं या देखी भी नहीं हैं,
देती दुआएँ होंगी हमें समय संग ढलना। 

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