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वर्ष: 1, अंक 12, मई(प्रथम) 2017



इन्द्रधनुषी रंग मचलते

हरिहर झा

स्पर्श,  
नयन का पा लेने को   
इन्द्रधनुषी रंग मचलते।   

स्वर लहरी   
मचलती काहे   
साँसो की सरगम क्या जाने;    
खूब मचलती जाती राहें  
पैरों की रुनझुन को सुनने;   

मधुर नृत्य की  ताल पकड़ने  
मृदंग के धिग थाप मचलते।  

कंगना थामे   
पकड़ कलाई   
ज्वार  नशे का   
पा जाये वो;   
प्यास नहीं   
फिर भी मिट पाई   
फूल बरसते छू ओठों को;  

अलकावली   चूम लेने को   
पंखुरियों के हार मचलते।   

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