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वर्ष: 1, अंक 12, मई(प्रथम) 2017



ताण्डवी निशाचरी

डॉ० अनिल चड्डा

ताण्डवी निशाचरी को हो रहा अर्पण सवेरा !
मेरे घर की चांदनी पर छा गया काला लुटेरा !!

जल रहा है, जल रहा है, आज सब कुछ जल रहा है,
आदमी का खून पी कर आदमी ही पल रहा है,
ज़हर खा कर नफरतों का, खुद ही खुद को डस रहा है,
देख भाई को ही मरता, आज भाई हंस रहा है,
किस की बातों से है बहका, प्रेम ज्योति का चितेरा?


हो गई ओझल दिशाएँ, आज बहकी हैं हवाएँ,
जो कभी होते थे रक्षक, वो ही अब भक्षक कहाएँ,
फूल बन डाली था खिलना, वो ही अब काँटे चुभाएँ,
क्या यही हमने पढ़ा था, मात के टुकड़े बटाएँ?
त्यागमूर्त को सिखाया, आज किसने तेरा-मेरा? 
 


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