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वर्ष: 2, अंक 33,  मार्च(द्वितीय), 2018



दहेज एक विष बेल


वीना सिंह


हमारे समाज में अनगिनत कुप्रथाएं बिषबेल की तरह फैली हुई हैं। जिनका हम न चाहते हुए भी दिन रात सामना करते हैं उन्ही में से सबसे घातक प्रथा है ’’दहेज प्रथा‘‘। दहेज प्रथा हमारे समाज को जर्जर करती आई है और कर भी रही है। जिसे हम मूक बने तमाशा ही नहीं देख रहे हैं बल्कि सहयोग देते रहे हैं। यही कारण रहा है कि उसकी जड़ें इतनी मजबूत हो गई हैं जिन्हे उखाड़ना असंभव सा हो गया है। बेटी के बोझ लगने का सबसे बड़ा कारण दहेज ही है। बेटी का जन्म होते ही माता - पिता को उसके विवाह और दहेज की चिन्ता सताने लगती है। पालन – पोषण, पढ़ाई - लिखाई पर पैसा न खर्च करके वे दहेज के लिए पैसा इकट्ठा करने लगते हैं। चैतरफा समाज को देखते हुए वे यह मान चुके हैं कि यदि हम लड़के वालों को दहेज न दे पाये तो हमारी बेटी ससुराल में कष्ट पायेगी और काफी हद तक होता भी ऐसा ही है। कन्या भ्रूण हत्या जैसा जघन्य पाप भी अधिकतर इस दहेज प्रथा के कारण होता हैं। जब - तक समाज में दहेज के नाम पर लेन-देन बना रहेगा तब तक इस समस्या का समाधान संभव नहीं है।

तर्क की दृष्टि से सभी इस दहेज प्रथा की निंदा करते हैं कि यह बुराई हमारे समाज से खत्म होनी चाहिए। परन्तु जब अपनी बारी आती है तो आगे कदम नहीं बढ़ाते। ऐसे लोग दोहरी मानसिकता रखते हैं। उन्हें दहेज लेने में यह प्रथा बुरी नहीं लगती पर देने में बुरी लगती है। इसीलिए खुलकर विरोध नहीं कर पाते और सदियों पुराना ढर्रा जस का तस चला आ रहा है। दहेज की चाहत में बेटियां ससुराल में तरह - तरह की यातनाएं पाती है। वर पक्ष की मांगे विवाह होने तक सीमित नहीं है बल्कि नित नई मांगे जीवनपर्यंत चलती रहती हैं। जिन माता पिता के पास धन का अभाव नहीं है वे ससुराल वालों की आनन - फानन मांगे पूरी करते रहते हैं परन्तु जो मांगे पूरी कर पाने में सक्षम नहीं है अक्सर उनकी बेटियां घरेलू हिंसा की शिकार होती रहती हैं। आये दिनों मारपीट से लेकर तलाक दे देने या फिर जान से मार देने की घटनायें सामने आती रहती हैं। माता - पिता अपनी बेटी की ऐसी दुर्गति से असीम पीड़ा से गुजरते हैं। पर कहीं न कहीं वे इसके लिए स्वयं जिम्मेदार होते हैं। यदि वे ‘‘न हम दहेज देंगें और न ही लेंगे‘‘ का नियम अपनाएं तो इस कुप्रथा का खुलकर विरोध भी कर सकें। अपने समाज की हर बुराई से हम सब अच्छी तरह परिचित हैं जिसकी उपेक्षा होनी ही चाहिए ऐसा कहते भी हैं परन्तु विरोध के समय हमेशा हम अपनी आवाज बन्द कर लेते हैं और उस ढर्रे के सामने नतमस्तक हो जाते है जिसमें हमारे पूरे समाज का अनर्थ ही अनर्थ है। हमारे देश में दहेज प्रथा के विरुद्ध नियम कानून बने तो हैं पर कारगर नहीं है उन्हें कारगर न होने देने में हमारे समाज का ही हाथ है। क्योंकि समाज अपनी तुच्छ मानसिकता के कारण ऊपर से जितना विरोध करता है अन्दर से उतना ही समर्थन करता हैं। इसीलिए कानून भी इसको जड़ से मिटा पाने में असमर्थ है।

अधिकतर लड़की वाले अमीर घर का लड़का ढूंढ़ने के चक्कर में अधिक दहेज देने के लिए बाध्य होते हैं उन्हे अपना दृष्टिकोण बदलना चाहिए कि अपनी बेटी किसी मध्यवर्ती परिवार में जाए, घर का काम काज करे, पति के व्यवसाय में हाथ बंटाए। परिश्रम करने से शरीर भी स्वस्थ रहता है और दिमाग भी अधिक तीक्ष्ण एवं प्रखर रहता है। ऐसे घरों में प्रतिभावान लड़कियों को सम्मान भी मिलता है और दहेज का सवाल भी प्रमुख नहीं होता। अपने काम को दुर्भाग्य नहीं सौभाग्य मानना चाहिए। परन्तु आज की सोच इसके बिल्कुल विपरीत है लड़कियां ससुराल में अपना काम भी नहीं करना चाहती वे भी चाहती हैं कि मैं इतना दहेज लेकर जाऊं कि वहां पर मेरा दबदबा बना रहे। माता - पिता भी बेटी की सुख सुविधा के लिए एड़ी - चोटी का बल लगा देते हैं। जबकि जितना पैसा दहेज में लगाना हो उतना अपनी बेटी की शिक्षा और तंदुरुस्ती अच्छी बनाने में लगाकर उसका भविश्य उज्जवल बना सकते हैं। माता - पिता अपनी बेटी को धन संपदा नहीं बल्कि शुभ संस्कार दें। जिससे वे एक नये परिवार की श्रेष्ठ रचना कर सकें।

दहेज प्रथा एक सामाजिक बुराई है। इसलिए इसको मिटाने के लिए पूरे समाज को आगे आना होगा। यदि प्रत्येक व्यक्ति बेटी और बहू में मतभेद करना छोड़ दे। दोनों को समान सम्मान दे। बेटी और बहू के बीच की इस दोहरी मानसिकता को मिटाकर ही इस कुप्रथा को मिटाया जा सकता हैए साथ ही विचारषील लोग अपने बेटे - बेटियों के विवाह बिना धूम - धाम के नितांत सादगी के साथ करने लगें तो यह दहेज देने का प्रचलन आसानी से समाप्त हो सकता है। प्रभावशाली वर्ग की इस सादगी को अन्य लोग सहर्ष अपनायेंगे। दहेजप्रथा हमारे समाज से ही शुरू हुई है तो समाज के लोगों की सूझ - बूझ से ही समाप्त होगी।


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