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वर्ष: 2, अंक 33, मार्च(द्वितीय), 2018



फिर विडंबना कैसी !


पुन्नू बीकानेरी


 
किस्मत की 
अंगीठी पर तप-तपकर
कुंदन हो चुका युवा
अर्जित नही कर पाता है 
बरसों बरस तक 
दो वक्त की रोटी तक
सियासत की साजिशें
समाज के ताने 
कर देते है उसको
अंदर ही अंदर छलनी 
बना देते है कुंठित 
करार दे देते अव्वल नकारा
फिर विडंबना कैसी ?
उसके जेबकतरा होने 
या लूटेरा, आतंकी, नक्सली
या फिर पेशेवर 
हत्यारा या शार्पशुटर होने पर 
जुर्म का सरगना बनने पर
सोचा कभी !
उसको अपराध की राह पर
जाने को आखिर 
मजबूर किसने किया है ।।

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