Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 33,  मार्च(द्वितीय), 2018



अकेला


तुलसी तिवारी


साल भर से घर में छाई हुई मुर्दनी को भंग हुआ पा रहा था वह। दादी रसोई में कुछ तल रहीं थीं जिसकी मीठी सुगंध से घर भरा जा रहा था। लगा जैसे शुद्ध देशी घी के पुए बना रहीं हैं

’’ दादी..!.दादी...ऽ. ...ऽ. ! जरा एक कप चाय के लिए कह देना विन्नी से!’’

’’ आ रही हूँ देव , मैं ही आ रही हूँ चाय के साथ कुछ और भी लेकर, बैठो जरा सा!’’ दादी के स्वर में इतने दिनो से एकाकार हुई उदासी का कहीं कोई अंश भी उसकी पकड़ में नहीं आया।

’’ कुंजू अभी स्कूल से नहीं आया दादी?’’ उसने जूते मोजे उतारते हुए पूछा। बाथरूम जाते हुए उसने सुना ’’ आ रहा होगा बेटा, उनके स्कूल में कोई प्रोग्राम होने वाला है कुंजू नाटक में भाग ले रहा है। इसीलिए एक घंटे बाद में छोड़ते हैं ।’’ अच्छा अभिनय करता है कुंजू , चलो ठीक है जैसे खुश रहे वैसे ही सही। वह सोच रहा था।

हाथ पैर धोकर तौलिए से मुँह पांेछता वह सिद्धेश्वरी के पास आ गया। इस समय प्याज के पकौड़े छन्न्-मन्न् करते सिंक रहे थे। अच्छा लगा उसे चाहे जिस कारण से हो दादी सामान्य जीवन में वापस तो आ रहीं हैं। साल से ऊपर हो गया था उन्हें हँसते हुए देखे। देव जब भी घर आता उससे अपने हजार दुखड़े रोतीं और हर बार अपनी किस्मत को दोष देतीं जैसे देव उनका कोई बड़ा हो।

’’ बस अब कुंजू आता ही होगा, ले तब तक तू अपनी पसंद के पकौड़े खा! मैं चाय ले आती हूँ।’’

’’ अरे! दादी ये आप की बाँह पर क्या हुआ?’’ देव ने उनकी बाँह पकड़ कर ़दाहिनी हथेली पलट दी। कलाई के पास की त्वचा जली हुई थी।

’’कैसे जल गई दादी? कुछ लगाया भी नहीं अब तक?’’ वह हाथ में रखी प्लेट टेबल पर रख बर्नाल लेने दूसरे कमरे में तेजी से चला गया।

’’ अरे कुछ नहीं रे! तू परेशान न हो । मुझे कुछ याद तो रहता नहीं गरम झारा उठाया और भूल गई कि अभी-अभी इससे भजिये तल रही थी बस छू गया जरा सा।’’ सिद्धेश्वरी ने लापरवाही से कह दिया।

’’अरे दादी! ऐसा काम मत किया करो तो, मैं अपनी पसंद की चीजें खाये बिना ही रह जाऊँगा, जब नहीं होता तो क्यों करती हो?’’ बर्नाल लगाते-लगाते वह क्षुब्ध स्वर में बोला।

जिम्मेदारियाँ बढ़ा कर परिस्थिति ने जैसे अड़ंगी मार कर गिरा दिया होे। उसकी जिम्मेदारी तो थी ही कुंजू की भी आ पड़ी। छोड़ कैसे दे अपना रक्त है। न उन्हें सुबह चैन न रात को। महरी ऊपरी काम कर देती है, वह स्वयं तैयार होते-होत कुंजू की तैयारी कराता है, दादी सभी का नाश्ता, टिफिन बनाती हैं दादाजी की पूरी सेवा टहल बजाती हंै, घर का रख-रखाव आना-जाना सारा कुछ तो उन्हीं के सिर पर है।

’’ ले चिन्ता मत कर बेटा रसोई करने वाले को इतना-उतना लगता ही रहता ही रहता है। ठीक हो जायेगा तू पकौड़े खा ले । उन्होने उसे बहला दिया।

’’लो फिर तुम भी खाओ!’’ देव ने एक पकौड़ा सिद्धेश्वरी के मुँह में डाल दिया फिर एक-एक पकौड़ा उठा-उठा कर खाने लगा। इतने में कुंजू भी आ गया, मुँह सूखा, बाल बिखरे, कपड़े मैले, सोफे पर बस्ता फेंका और वैसे ही देव से लिपट गया। ’’भइया! आज मुझे एक लड़के ने मारा, मैं गिर पड़ा, देखो मेरे कपड़े गंदे हो गये।’’ वह रोने लगा। उसे देव ने अपनी गोद में बैठा लिया

’’ मैं कल स्कूल जाकर उसे डँाटुंगा, तुम परेशान न हो कुंजू, जाओ कपड़े बदल कर मुँह हाथ धो लो!’’ उसने कुंजू के बाल संवारे।

’’ अरे मेरे बच्चे को किस शरारती ने मारा?’’ सिद्धेश्वरी दौड़ी आईं।

’ ’’ कुछ नहीं दादी वह दोस्त ही है मेरा। छोड़ो!, अब मार दिया तो मार दिया।’’ कुंजू ने सयाने की तरह बात संभालने की कोशिश की और अंदर के कमरे में जाकर कपड़े बदलने लगा। बड़ा भावुक है कुंजू नौवें वर्ष में लगा है परन्तु छोटे बच्चे जैसे बार-बार देव के सीने से चिपकता रहता है, झट आँखों में आँसू भर आयेंगे, झट होंठ मुस्कराने लगेंगे,इतनी सी उम्र में सहा भी तो बहुत है न उसने, अभी इसी इतवार को तो दिव्या की वर्षी थी, लंबी,छरहरी ,गोरी-नारी तीखे नैन नक्श वाली दिव्या से जब दादी ने पापा की शादी तय की तब उससे पूछा था एक बार ’’ बेटा अकेले कब तक जीवन की गाड़ी चलेगी? अच्छी लड़की मिल रही है, उसकी भी माँ नहीं है, वह तेरा दर्द समझेगी, फिर बेटा माँ कहे बिना तू इतनी बड़ी जिन्दगी कैसे गुजारेगा, वह उनकी गोद में सिर छिपा कर रो बहुत रोया था। ’’नहीं दादी, मुझे दूसरी माँ नहीं चाहिए, मैं ऐसे ही ठीक हूँ। दादी ने पापा के पक्ष में दलीलें दी थीं अपनी उम्र का हवाला दिया और एक दिन दिव्या आ गई उसकी माँ के स्थान पर। दादी को उसने देखा था, कमरे में जाकर रोती और आंगन में आकर औरतों के बीच नाचती हुई

’’ मेरे बेटे का उजड़ा घर बस रहा है, मैं नई बहू को पूरे मन से अपनाऊँगी ताकि उसे लगे कि उसकी माँ अभी मरी नहीं है।’’ अन्दर ही अन्दर बुदबुदातीं-

’’यदि तूने सब कुछ छोड़ा न होता तो ये दिन देखने को क्यांे मिलता?’’ वे आँसुओं से आँचल भिगातीं, उसे सिखाया गया ’माँ’ कहो दिव्या को्’’ उसने कहा भी लेकिन इसके अवसर बहुत कम आये, कहाँ वह नई नवेली दुल्हन और कहाँ वह दस वर्ष का बालक! मातृभाव जागा ही नहीं उसके हृदय में, खैर दादी के कारण उसे कहीं कोई कमी का एहसास नहीं होने पाया। हाँ! पापा 125 प्रतिशत दिव्या के हो गये। शायद वे अपनी पुरानी कहानी से बेहद भयभीत थे अन्दर ही अन्दर।

’’चलो जैसी भी हो घर में एक औरत तो है? कुछ करे या न करे चलेगा। दिव्या को सबसे अधिक दादी और देव से समस्या थी।

’’ मैं इतने बड़े बच्चे की माँ लगती हूँ? कह दो इससे सबके सामने माँ न कहा करे !’’ कैसी निर्दयता से मारा था पापा ने उसे ।

’’ न कपड़े का रंग ढंग न चेहरे का, सब के बीच चला आया माँ...माँ कहते पार्टी में, समझ नाम की तो कोई चीज ही नहीं है इसके दिमाग में। ’’

’’ ये क्या कर रहे हो अभय? इतना ही था तो अपने साथ उसे भी तैयार करके ले गये होते।’’ दादी आईं थीं बीच में, उन्हें पूरी ताकत से ढकेल दिया था उन्होंने, धड़ाम से गिरी थीं वे । वह तो डर के मारे रोना भी भूल गया था।

’’ देव! घर साफ कर ले, बगीचे में पानी डाल दे, सीढ़ियाँ धो डाल । टाॅयलेट की दीवारें गंदी हो गईं हैं कपड़े से रगड़ कर धो डाल, तेरे पापा को अच्छा लगेगा। सी. एम. ओ. हैं आखिर को गंदगी से बहुत चिढ़ते हैं । एरे अभी तक नहीं हुआ ?ये लड़का तो किसी काम का नहीं है । दतनी देर में जरा सा काम नहीं कर पाया,

’’कर तो रहा हँू उसने बेचारगी से उसकी ओर देखा था।’’

’’जबान चलाता है ? ले चला जबान !’’ उसके सिर पर चप्पल की भरपूर चोट पड़ी थी। फिर तो कोई जगह खाली नहीं बची। वह रोने लगा।

’’रोयेगा तो और दूंगी खाने भर को ठूसने भर को है किलो भर जरा काम कहो तो दस ठो नाटक! चल जल्दी नाली साफ कर ले ! आज स्वीपर नहीं आया है।’’ वह बहते आँसुओं की अनदेखी कर जल्दी-जल्दी झाड़ू चलाता।

’’अच्छा हो गया ? जा दुकान से सामान ले आ!’’

’’ भूख लगी है माँ!’’

’’जा फ्रिज़ में रोटी रखी है नमक के साथ खा ले! और हाँ आज स्कूल मत जाना, मेरे दोनो भाई आने वाले हैं उनकी सेवा करनी होगी। तेरे पापा ने कहा है देव सब संभाल लेगा।’’

पसीने से लथपथ वह दादी के पास आता,

’’कुछ खाया सुबह से ?’’ चेहरे की रंगत देखते ही उनकी आँखों में पीड़ा उतर आती।

’’खाऊँगा दादी।’’

’’अरे! दोपहर ढल रही है ,तू कर क्या रहा था अब तक ?’’ वे जल्दी से कुछ खाने के लिए लातीं ।

’’ उसके लिए बनाती हो तो सबके लिए बनाओ! हम क्या आपके बच्चे नहीं हैं?’’ उसने रसोई की तरफ झाँकना भी छोड़ दिया था। उसके दोनो भाइयों की खातिर करते-करते दादी को दाँतों पसीना आ रहा था। दिव्या के स्वभाव के कारण वर्षों पुरानी महरी और रसोइया काम छोड़ कर चले गये थे। पापा के सिर पर उन दिनो न जाने कौन सा भूत सवार रहता था, घर आते ही खोज-खोज कर दादी और उसकी खबर लेते रहते ’’तुम ही बिगाड़ रही हो लड़के को, तुम्हारे कारण ही मेरा घर उजड़ा था, अब क्या चाहती हो मैं फिर से रड़ुआ हो जाऊँ? तो सुन लो अब ऐसा नहीं होगा। तुम्हारी एक न चलेगीं। दादी के आँसू अपनी व्यथा कथा कहते। वह घुट कर रह जाता। कभी-कभी तो दरवाजा बंद करके फुट-फुट कर रोता ।

’’ भगवान् तूने मुझे जन्म ही क्यों दिया? मेरे कारण परिवार में हमेशा कलह मचा रहता है। बहुत जल्द ही दिव्या ने अपना चुल्हा अलग कर लिया। अब तो बस जब लानत मलानत करना हो या लड़ना हो तभी बातचीत होती।

साल के अन्दर ही सर्वसुविधा युक्त दो मंजिला मकान बन कर तैयार हो गया। देव के लिए स्पष्ट हो गया कि वह दादा-दादी के साथ रहे या नाना-नानी के साथ, नये घर में उसके लिए कोई स्थान नहीं था। दादा-दादी ने उसे अपनी गोद में स्थान दिया। एक बार पुनः बच्चे वाले बन गये। इसी बीच इस कुंजू का जन्म हुआ। उसे तो अच्छा लगा था, माँ की गोद में छोटा सा भाई, हाँ ! उसने तो सदा माँ ही समझा था। भले ही ममता भरा हाथ उसके सिर पर कभी न फिरा हो। थी तो आखिर माँ ही ।

’’देव! आज मेरी सहेली आ रही है दिल्ली से अपनी पोती के साथ, देखना यदि तुझे अच्छी लगे तो...............ऽ... .ऽ..?

’’ क्या दादी तुम्हें तो बस यही एक काम रह गया है। अभी-अभी नौकरी लगी है थोड़ा धीरज रखो, फिर हमें इतने भयानक हादसे से गुजरे दिन ही कितने हुए हैं? थोड़ा तो वक्त लगेगा न संभलने में । कुंजू को भी जरा सामान्य होने दो। ’’ उसकी निगाहें झुकी हुई थीं।

दुःख भुलाने से भुलता है बेटा, इस सीने पर जवान बेटे और दो-दो बहुओं की मौत का बोझ है। सामने तुम न होते तो हमारे जीने का बहाना ही क्या था? सोचती हूँ अपनी आँखों के सामने तेरा घर बसता देख लूँ, जब तेरी ही रोटी का ठिकाना न रहेगा तो कुंजू को कैसे पालेगा? ’’ उनका स्वर आद्र हो उठा, आँखों से आँसू बह चले।

’’ दादी! आप ही समझाती हो आप रोती हो, हम हैं नऽ एक दूसरे के लिए? उसने दादी को कंधे से लगा कर सान्त्वना दी।

दरवाजे पर दस्तक हो रही थी, उसने आगे बढ़ कर दरवाजा खोला। आॅटो वाला सामान उतार कर रख चुका था। दादी की हमउम्र एक महिला एक सुंदर सी युवती के साथ दरवाजे पर खड़ी थी। सस्ंकार वश उसने महिला के पैर छू लिए। युवती ने हाय! कह कर उसका अभिवादन किया। वह उनका सामान अन्दर ले आया। दादी अपनी गीली आँखें पोंछ कर उस महिला के गले मिलीं और बड़े अपनेपन के साथ ड्राईंगरूम में ले आईं। वे उनके आगत-स्वागत में ऐसी लगीं कि अपने सारे दुःख जैसे भूल ही गईं। वह अपनी पकौड़े की प्लेट पकड़े अपने कमरे में चला गया। अनायास उसकी नजर सामने की दीवार पर जा कर ठहर गई। वहाँ पापा की फोटो फूलों के हार पहने दीवार पर टंगी थी। छः फुटे जवान, पापा का रंग अंगारे की तरह दहकता था, थके होने पर चिड़चिड़ाते थे। अस्पताल की हजारों समस्याएं, घर में भी उनका पीछा नहीं छोड़तीं थी। कभी प्रसन्न होते तो अत्यंत मीठी मुस्कान छा जाती चेहरे पर। कभी-कभी ठहाके भी सुने थे उसने।

उन्होंने सोचा था अलग रह कर वे अपने नये परिवार के साथ खुश होंगे दादी और देव नाम के दोनो काँटे अपने जीवन से निकाल कर फेंक दिया था उन्होंने । अक्सर घर पर बड़ी-बड़ी पार्टियाँ होतीं, दिव्या भाँति-भाँति के श्रंृगार करती, कभी कभी पापा उसे भी बुला लेते, उसने कभी उनकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया।शायद कभी ममता की खोई हुई छाँव मिल जाय।

एक दिन सुबह-सुबह कोहराम मचा मोहल्ले में, सभी दौड़े, पापा का जिस्म उनके कमरे में पंखे से लटक रहा था। दिव्या पछाड़ खा-खा कर रो रही थी। दादी दादा रोते- बेहोश होकर गिर प़डे थे। उसकी आशा पर तुषारापात् हो चुका था, अब जब पापा ही न रहे तो वह किसे मनायेगा? किसे समझायेगा कि उनके अंश से जन्म ले कर उसने कोई अपराध नहीं किया।

माँ के समय तो वह अबोध था। पापा के समय उसने जीवन के इस कटु सत्य का गहराई से अनुभव किया। आनन फानन में दिव्या के मायके वालों ने सब कुछ अपने हाथ में ले लिया। अत्येष्ठी में भी दादा दादी परायों की तरह दूर-दूर रखे गये।

थोड़ी भाग दौड़ के बाद दिव्या को स्वास्थ्य विभाग में नौकरी मिल गई।(अनुकम्पा नियुक्ति) वह कुंजू के साथ मायके चली गई और वहीं से ड्यूटी करने लगी। महराज पुर के घर में ताला बंद हो गया। लुटे-पिटे से दादा-दादी और हत्प्रभ सा देव, आते-जाते घर में लगे ताले को देख-देख कर रोया करते।

’’सब कुछ खत्म हो गया, बेटा गया अपना अब क्या रह गया? जहाँ रहे बहू अपने बच्चे के साथ खुश रहे। हाँ पड़ोसियों के मुँह से सुना अवश्य गया कि देव और सिद्धेश्वरी का नाम लेकर दिव्या हमेशा लड़ती रहती थी कि तुम अपनी माँ और बेटे से मिलते-जुलते हो । बड़ी की तरह मैं भी मर जाऊँगी परन्तु यूँ ही नहीं मरूंगी तुम लोगों को फँसा कर मरूंगी। संभवतः इसी दिन-रात के कलह ने पहाड़ जैसे आदमी से कायराना फैसला करवाया था। अब तो देव के लिए ही जीना है मना लिया था दोनो ने खुद को।

अकाल मृत्यु की यह पहली घटना नहीं थी इस घर में, पापा के पहले माँ ने भी तो स्वयं को आग के हवाले कर दिया सात साल के देव का मोह त्याग कर । सी. एम. ओ.होने के कारण पापा ज्यादा समय घर पर नहीं दे पाते थे । कहते हैं माँ निराशा और संदेह के गहरे गर्त में गिर पड़ीं थी। उन्हें लगता उनका पति तो सैकड़ों सुन्दर स्त्रियों से घिरा रहता है अवश्य उनसे उसका संबंध होगा तभी तो वह ’सूप के कोने’ जैसी पड़ी घर में मक्खियाँ हाँका करती है। दादी के समझाने पर भी कोई असर नहीं हुआ था उन पर । ऐसा ही तो सुना है देव ने दादी से।

और सपना को आये लगभग महिना भर हो चुका था। गरीब परिवार की पढी-लिखी लड़की दादी को तो सोलह आने जँच गई थी। वह घर के सारे काम करती, दोनो सहेलियाँ बैठी बातें करती रहतीं अपने जमाने की। वह रोज-रोज नये-नये व्यंजन बनाती, दादा जी से दोस्ती गाँठ ली थी उसने।

कुंजू से गहरी छन रही थी सपना की। देव वैसे तो लड़कियों से कम ही बोलता है किन्तु सपना से बोलने लगा था।

’’सिद्धू देख! तुझे यदि पैसे का लालच हो तो जाने दे, नहीं तो सपना जैसी लड़की आज के जमाने में दीया लेकर खोजने से भी नहीं मिलेगी तुझे। सारा कुछ संभाल लेगी। तू देखती रहना केवल।’’ परमेश्वरी दादी को विश्वास दिला रही थी। देव की कनपटियों पर हथौड़े की चोट पड़ी उसे गोद में लेकर दिव्या ने क्या कहा था-

’’मैं देव को अपनी जान से ज्यादा प्यार करूंगी!’’ खूब भोगा था देव ने उसके प्यार को।

’’ देव ! परमेश्वरी दादी पूछ रहंी हंै बता दे तुझे सपना पसंद है या नहीं?’’ साफ-साफ पूछा था दादी ने उससे। अच्छी है दादी ,परन्तु शादी का विचार अभी नहीं है मेरा। उसने कहा तो था किन्तु लगता है किसी ने सुना नहीं था। सपना उसका विशेष ख्याल रख रही थी।

उस दिन वह कुंजू को लेकर अस्पताल गया था, जब ड्यूटी से आया तो उसकी लाल आँखें देखते ही समझ गया था कि उसकी तबियत ठीक नहीं है। दादी ने कहा था कि यह कल से ही अनमना है दिखा दो जरा डाॅक्टर को । अस्पताल में बड़ी भीड़ थी, शायद कोई दुर्घटना घटी थी। लोग रोनी सूरत बनाये खड़े थे। यही हाल तो उनका भी हुआ था न वर्ष भर पहले, दिव्या मिटिंग में जा रही थी हेड आॅफिस, ट्रेन पर चढ़ते समय हाथ छूट गया और ट्रेन चल पड़ी, वह पटरी पर गिरी और अनेक टुकड़ों में विभक्त हो गई। बोरे मे भर कर लाना पड़ा था पोस्टमार्टम के लिए। इस बार भी मायके वाले झूम गये थे, सब कुछ किया उन्होंने सारा घर साफ कर गये बैंक में कहाँ क्या था ये तो वे ही जाने धर की बसीयत थी दिव्या के भाई के नाम बस कुंजू को पहुँचा गये तेरही के दो दिन बाद।

’’ माँ जी! कंुजू आपकी अमानत है आप का खून है। यह आप के पास ही शोभा देता है, जैसे देव को बड़ा किया वैसे ही इसे भी पाल लेंगी आप, हमें विश्वास हैं फिर तो साल भर हो गये कोई खोज खबर नहीं ली किसी ने।’’

सपना का रंग चढ़ कर रहेगा मुझ पर कैसे मना करूँ? मुझ जन्म के अभागे,प्यार के भूखे को इतना चाहने लगी है वह। कैसे बचाये स्वयं को देव? उसे वायदों की सच्चाई का ज्ञान है, जो कुछ सिखाया है समय ने उसे वह भूल नहीं सका है ।

रात जब दादी दादा सो गये तब सपना आई थी उसके कमरे में। उसकी आँखें प्रश्न पूछ रहीं थीं ’’मुझमें क्या कमी है जो मुझे ठुकरा रहे हो?’’

’’ सपना कल सुबह बात करते हैं मैं कुंजू को सुला रहा हूँ ,तुम्हें पता है न इसकी तबियत खराब है? उसने सहजता से कहा था।

‘‘ आप के जीवन में कुंजू के सिवा किसी और का कोई महत्त्व है भी या नहीं वह झुंझला गई थी।

’’ मंैने कहा न कल बात करेंगे।’’

वह पैर पटकती चली गई थी। दादी के सामने पेशी हुई थी उसकी- ’’बोलो देव क्यों उलझा कर रखे हो इन्हें ?’’

’’ क्या बोलूंँ दादी?’’

’’सपना से तुम्हारी शादी पक्की कर दूँ न ऽ?’’

’’ नहीं दादी! अभी मैं इस चक्कर में नहीं पड़ना चाहता, मुझे क्षमा कर दीजिये।’’ उसकी निगाहें धरती पर जमी हुईं थी।

’’कारण बताने की कृपा करोगे?’’ दादी का चेहरा अपमान से पीला पड़ गया था। उन्हें अपने देव से ऐसी उम्मीद नहीं थी।

’’ जब तक कुंजू बड़़ा नहीं हो जाता मैं सिर्फ इसी के लिए जिऊँगा।’’ उसके स्वर मंे दृढ़ता थी।

’’ अरे बेटा! कुंजू की भली लगाई, बहू रहेगी तो तुझे कंुुजू की क्या चिंता करनी पड़ेगी?’’ दादी के चेहरे की बुझी हुई रौनक वापस लौटी।

’’ दादी जिस भैंसे की ंिसंग होती है वही उसे संभालता है किसी अन्य पर जिम्मेदारी डालना मैं उचित नहीं समझता बस्स। और यह समझ मेरे अनुभव से आई है।’’ वह सामान्य था।

’’ तो क्या तुम्हें मेरी पोती पर विश्वास नहीं है?’’ परमेश्वरी ने रोते हुए पूछा था।

’’ दादी जी, मुझे स्वयं पर भरोसा नहीं है अपनेपन की भूख मेरे मन में हद से ज्यादा है, कहीं मैं इतना स्वार्थी न हो जाऊँ कि कुंजू एकदम अकेला रह जाय मेरी तरह।


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें