Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 33,  मार्च(द्वितीय), 2018



*पताल के चटनी

मिर्ज़ा हफ़ीज़ बेग


सुमति ने फिर से एक बार अच्छी तरह टटोल कर देखा । वहां प्याज के सिवा कुछ नही था । उसे पता भी था कि यहां प्याज के सिवाय कुछ नहीं है । वह यह भी अच्छी तरह जानती थी कि बार बार ढूंढने से कोई एक भी प्याज, टमाटर नही बन जाने वाली । लेकिन वह अब दिल को कैसे समझाये । फिर आज कल उसके अंदर दो दिल एक साथ धङक रहे थे । आशाओं का एक संसार उसके अंदर करवट ले रहा था । आंखो मे वे सपने फिर अंगङाई लेने लगे थे जो उसकी पढ़ाई छुङवा कर शादी कर देने के कारण टूट कर बिखर चुके थे । कैसा सुखद, जादुई अहसास था यह । हां ! यह जादू ही तो था । वह दिन भर अपने आप मे खोई रहती । कभी हंसती कभी रोती । अपने अंदर पनपते एक नये जीवन को महसूस करके एक सनसनी सी महसूस करती । कभी खिलखिलाती कभी चुपके चुपके मुस्कुराती और कभी लाज से मर जाती । लोग उसके बारे मे क्या कह रहे हैं; यह जानने को मन हमेशा बेचैन रहता । वह जानती है, लोग अब जो भी उसके बारे मे कहेंगे, अच्छा ही कहेंगे । अब उसके बारे मे कही गई हर एक बात उसे रोमांचित कर देती ।

रोमांचित तो उसका पति सोहन भी है । पहली संतान जो है । लेकिन सुमति को उसके अंदर इतना उत्साह नही दिखाई देता । "मरद मन असनेच् होथे ।" वह अपने दिल मे कहती । लेकिन जब सोहन घर आता और उसकी नजर सुमति के पेट पर पङती तब वह सुमति की ओर देख इतने प्यार से मुस्कुराता कि सुमति लाज से गङ जाती ।

"धत् . . , " वह इतना ही कह पाती ।

आजकल वह सुमति का ध्यान भी कितना रखता है । सबसे बढ़कर तो उसके खाने का । अगर आधी रात को भी सुमति कोई फरमाइश कर दे , वह पूरी करने मे जी जान लगा देता है । आजकल उसके खाने पीने की चिन्ता तो सारे अङोस पङोस को है । पङोस ही क्यों, सारे गाँव को है । कहीं किसी घर मे कुछ विशेष बने, सबसे पहले उसके लिये किसी बच्चे के हाथ भिजवा दिया जाता- " जा त् रे ! सोहन बहू बर देके आ ।" बच्चों को भी इस काम मे बङा रोमांच आता ।

यह अवस्था भी ऐसी ही होती है । मन एक बच्चे की तरह होता है ; खास करके खाने पीने के मामले में । कब किस चीज से उबकाई आ जाये, कब किस चीज के लिये मचल जाये कोई भरोसा नहीं । जैसे आज । आज उसका दिल टमाटर की, सिल पर पीसी हुई चटनी और भात खाने के लिये मचल गया । लेकिन उसे पता था , टमाटर तो घर मे मौजूद नहीं है । घर क्या पूरे गाँव में किसी के घर नहीं होगा । कौन खायेगा सौ रुपिया किलो का टमाटर ? पांच दस रुपये का टमाटर, सौ रुपये मे कौन खरीदेगा ?

अभी दो महीना पहले तो गांव भर मे टमाटर ही टमाटर थे । आधे से जयादह किसानो ने टमाटर की फसल ले रखी थी । कारण था, आसान फसल और गांव के पास मे ही केचप बनाने की फैक्टरी लगी थी । किसानो ने सोचा , चलो खङी फसल बिक जायेगी । मंडी जाने की नौबत नहीं आयेगी । पैसा भी नकद मिल जायेगा । जो फसल अतिरिक्त हो गई तो बाजार तो है । लेकिन किसान का साथ तो भगवान भी नही देता , फिर किस्मत क्या देगी । जब फसल आई, बाजार में टमाटर के भाव गिर गये । चिल्लर बाजार मे दस रूपये का डेढ़ किलो बिकने लगा । शहरों मे घर की औरतों ने सस्ते टमाटर से खूब सारा केचप बनाकर घर की सारी बोतले भरकर रख ली । केचप तक का उठाव बंद हो गया । केचप बनाने वाली फैक्टरी ने भी उत्पादन बंद कर दिया । अब केचप फैक्ट्री बंद हो गयी तो किसानो ने शहर की सब्ज़ी मंडी का रुख किया । सोहन ने भी अपनी बाङी के टमाटर की पहली खेप सब्ज़ी मंडी ही ले गया । लेकिन दाम इतने गिरे हुये थे कि, टमाटर बेचकर गाङी का भाङा भी नहीं निकला । टमाटर तुङवाने और लदाने की मजदूरी तो दूर की बात है । यह देखकर बाकी किसानो ने जो टमाटर तुङवाकर रखे थे । नुकसान कम करने के लिये सङक पर फिकवा दिया । तुङवाई की मजदूरी देने के लिये किसी ने घर का धान बेचा किसी ने कर्ज लिया । सब्जी बाजार के कोचियों ने भी मांग के अभाव मे बाङियों से टमाटर उठाना बंद कर दिया । जब बाङियों मे टमाटर पक कर सङने लगे और दाम सुधरने की कोई उम्मीद नहीं रही तो खेत साफ करवाने के लिये किसानो ने टमाटर चरने के लिये मवेशी ऊतार दिये । एक वह दिन था और एक आज का दिन है, कि एक अदद टमाटर के लिये वह पागल हुई जा रही है । करे भी तो क्या ? दिल कैसा भी तो हुआ जा रहा है । शाम को उल्टी के बाद से ही *पताल चटनी के लिये मन मचल रहा है । अब जब तक यह मिल न जाये उसे सूकून नही मिलने वाला । अब और कुछ खाया भी नही जायेगा । क्या करे किससे मांगे । जो उसकी रसोई का हाल , वही सारी बस्ती का हाल । *पताल तो किसी घर मे नही मिलेगा । इन दो महिनो मे तो *पताल यानि टमाटर के दाम मे आग लग गई है । जहां दो महिना पहले यह दस रुपये का देढ किलो बिक रहा था, आज सौ-सवा सौ रुपया किलो बिक रहा है ।

उससे रहा नहीं गया तो पड़ोस मे बिसहिन भाभी यहाँ दस्तक दी- “भाभी, एक ठन *पताल आय का ? * पताल के चटनी पीस के खाये बिन मोर मन माढ़य नई आज ।“

बिसहिन ने प्यार से झिड़की दी “तैं काबर सांझ कुन बाहर निकले ओ ? मोला नई आवाज़ दे रहते ?”

बिसहिन को उसके हाल पर तरस आरहा था । औरत के पीरा ल औरत ही जाने । बेचारी के दिन भी पूरे होते आरहे हैं ।

“ले चल बईठ ।“ उसने सोहन बहू को बैठाते हुये पूछा, “सोहन कहां आय ओ ?”

“कोन जानी भाभी, बईठे होही कोनो डहार, संगी साथी संग म ।“ सुमति ने शिकायत भरे स्वर मे कहा । भले उसे सोहन से कभी कोई शिकायत नहीं रही, लेकिन अपनी जेठानी की प्यार भरी बातों ने उसके अंदर की उस बच्ची को जगा दिया । वह छोटी सी बच्ची, जिसे हर बात मे शिकायत रहती थी । “छोटू - - -“ बिसहिन ने अपने बेटे को आवाज़ देकर कहा “जा तो रे राधा काकी इंहा देख तो, एक ठन* पताल होही त् । चाची के *पताल के चटनी खाय के मन आय, बताबे । उंहां नई होही त् सुमन मौसी इहां तियारबे । उंहा नई होही त् आन घर म पूछबे । काकरो घर मिलही त लेत आबे ।“

“सब मरद मन अएसनेच् होथे ।“ छोटू से फ़ारिग होकर वह सुमति से मुखातिब हुई, “अरे ! खेत खार म काम बूता नई त् घर म ध्यान देना चाही न ? आन दे तोर जेठ ल कहूँ धमकाये बर ।”

“नई नई भौजी । बुरा लगा लिही - - - ।“

दोनो की बातें खतम नहीं हुई कि छोटू पूरे मुहल्ले का चक्कर लगा कर लौट आया । जैसा कि दोनो औरतें अनुमान लगा रही थीं । वह खाली हाथ आया था । टमाटर किसी के घर नहीं था । होता भी कैसे ? मुहल्ले मे इतना महंगा खाना खाने की किसकी अवकात थी । दो महिना पहले की बात और थी । सुमति लौट आई । बिसहिन पहुंचा गई ।

आधे घंटे बाद सोहन लौट आया । वह आज ठगा सा महसूस कर रहा था । आज सब दोस्तों के बीच यही चर्चा चली थी कि, टमाटर की जगह* गोंदली यानि प्याज़ लगाते तो अच्छा था । प्याज़ को रखा भी जा सकता है, और अभी प्याज़ के दाम भी बढ़ने वाले हैं । सोहन ने इस बात का समर्थन किया तो दुर्गा बीच मे बोल उठा था- “दाम बढ़ने का फ़ायदा कभी किसान को मिला है ? वो तो बाज़ार के बिचौलियों के जेब मे ही जाता है ।“ इस बात ने सोहन को खिन्न कर दिया था । उसे लगा जैसे सारी दुनियां मिलके उसे ही ठग रही है । सच है किसान से बड़ा बेवकूफ़ कोई नही । उसने आह भरी । लेकिन किया क्या जा सकता है ।

घर पहुंचा तो वह खिन्न था । लेकिन जैसे ही उसे पता चला सुमति को *पताल की चटनी खानी है वह तुरंत लौटा और अपने एक एक मित्र का दरवाज़ा खटखटाया लेकिन टमाटर नहीं मिलना था सो नहीं मिला । रात मे सुमति तो सो गई लेकिन सोहन को नींद कहां ? अब तो गांव भर जान चुका है कि सुमति को *पताल की चटनी खाने की इच्छा है । अभी कुछ दिन पहले गांव भर के जानवरों को भरपेट टमाटार खिलाने वाला सोहन अपनी गर्भवती पत्नी के लिये एक टमाटर नहीं ला सका । धिक्कार है - - -

किसी करवट चैन नही आ रहा था । वह कभी इतना मायूस तो नहीं हुआ था । उसे अपनी मजबूरी पर रोना आ रहा था । गाँव भर मे किस दरवाज़े नही गया । सारा गाँव ही दुखी था । लेकिन कोई भी कुछ नही कर सकता था । अंत मे शंकर ने सलाह दी कि किराना वाले सेठ के यहां एक बार देख लेना चाहिये । सोहन जानता था वह किराना दुकान मे सब्ज़ी नहीं बेचता । ज़्यादा से ज़्यादा आलू और प्याज़ बेच लेगा बस । क्या पता बेचने के लिये नहीं तो खाने के लिये ही रखा हो । इतना महंगा तो गाँव भर मे वही खा सकता है । लेकिन उसके घर भी एक टमाटर नहीं निकला । उल्टा उसने उनको खरी खोटी सुना दिया- “देखै भगवान के न्याव ल ? कालि रोड म फ़ेके रहेव, जानवर ल खवादे हव उही चीज़ बर भगवान ह कईसने नचावत हे । आय अकल ठिकाने ?”

“हमारी अकल ठिकाने लगायेगा, साला चोरहा ।“ सोहन करवट बदलते हुये बड़बड़ाया, “फ़ोकट के माल चाही, किसान के मेहनत के मोल नई । कहे रहन वो टाईम मे सेठ खड़ी फ़सल ले ले । जो देना है दे दे, अपन मजदूर लगा के तुड़वा ले । काय कहत रिहिस ? तुड़वाके देना है तो दे, कमाने बैठे हैं । घाटा उठाने नही । ए साल तो बाड़ी मे टमाटर फ़ोकट मे भी महगा है । अब सिखाता है । रोड मे फ़ेका हुआ टमाटर तो बोरे भर भर कर ले गया है । भगवान जाने क्या किया है ।“

बिस्तर जैसे काटने लगा था । लगा जैसे बिस्तर मे बहुत सारे सूखी घांस के तिनके रह गये हों । वह बिस्तर से उठ बैठा । अपना बिस्तर बाहर लेजाकर झटक कर फ़िर लगाया । लेकिन आराम अभी भी नहीं था । लगने लगा जैसे बहुत ही छोटे-छोटे कीड़े बिस्तर पर रेंग रहे हों । लगता है, चीटियां हो गई हैं । लेकिन चीटियां काट तो नहीं रही - - - लगता है, काली चीटियां हैं । यह सोंचते ही वह घबरा कर बिस्तर से कूद कर दूर जा खड़ा हुआ । उसे काली चीटियों से बड़ी घृणा होती थी । वे काटती नहीं लेकिन उनके शरीर पर चलने से ही एक अजीब सा घिनौना अहसास होता है । इससे तो अच्छी लाल चीटियां है जो काट तो लेती हैं लेकिन कभी इतना घिनौना स्पर्श नहीं देती । उसने लाईट जलाकर बिस्तर को अच्छे से चेक किया । कहीं कुछ नही है । फ़िर अपने शरीर पर हाथ फ़ेर फ़ेर कर देखने लगा लेकिन कहीं कुछ नहीं है । शरीर पर कुछ रेंगने जैसे अहसास का वहम उसकी अपनी कल्पना का नतीजा ही है ।

उसने घड़े से निकाल कर एक लोटा पानी पिया, और लाईट बुझाकर अपने बिस्तर पर आ बैठा । सुमति इत्मिनान से सो रही थी । अंधेरे मे भी सुमति को अपनी कल्पनाओं की आंखों से वह बिल्कुल साफ़ साफ़ देख सकता है । सोती हुई कैसे बच्चे जैसी लगती है - - - । वह सोंचने लगा । अच्छा है, गहरी नींद मां बच्चे दोनो के लिये अच्छी है । फ़िर वह लेट गया ।

सुबह उठते ही उसने प्याज़ देखा । करीब दस किलो होगी । उसने सारी प्याज़ एक झोले मे भरी और निकल गया । सुमति अभी सोई हुई थी । उसे उठाना अभी ठीक नहीं है, सुबह उठेगी तो उल्टियाँ करने लगेगी; फ़िर वह जा नही पायेगा । यही ठीक है, उसे सोने दो ।

सेठ की दुकान अभी खुली नहीं थी । उसने आवाज़ दे दे कर सेठ को जगाया ।

“का होगे रे ! अतेक बिहनिया काबर आगे ?” सेठ आंख मलते हुये बड़बड़ाया ।

“सेठ, मोला ये पियाज बेचना आय ।“ वह बोला ।

“का अईसने पैसा के जरूरत आगे रे ?”

“टमाटर नाने बर पईसा नई ये ।“

“अतेक बिहनिया कहां जाबे रे, टमाटर बर ।“

“दुरुग जाहूं सेठ । नई त् भिलाई चल दुहूं । मंडी त खुल गे होही ।“

“लेकिन मोर कर पहिले के पियाज त् धरे आय रे । मै पियाज लेके का करहूँ ।“ सेठ ने अपनी पहली चाल चली ।

“कोचिया मन आही तो वोला देदेबे । मोला पईसा के जरूरत आय सेठ ।“ सोहन का रक्षात्मक जवाब ।

“त् तैं काबर नई देदेते कोचिया ल ?” सेठ एक बार फ़िर आक्रामक चाल चलता है ।

“देर हो जाही सेठ ।“ सोहन करीब करीब गिड़गिड़ा उठता है । वह चाहता है कि सुमति के उठने से पहले टमाटर लेकर घर पहुंच जाउँ; नहीं तो सुबह उठने के बाद उल्टी के मारे उसका क्या हाल होगा ।

“देख पियाज के भाव अभी बढ़ना सुरू होये हे त् पंद्रा बीस रुपिया चलत रिहिस । फ़ेर कोचिया त् सात आठ रुपिया मे लिही तबेच कमाही । एकर सेति मै तोला पाँच रुपिया किलो ले जादा नई दे सकौं ।“

“ठीक है सेठ, इ ले पियाज जल्दी काटा कर ले । दस किलो से कम नई होही ।“

सेठ ने देखा यह तो दस किलो से ज़्यादा ही होगी ।

“ठीक आय रे, तोर ज़बान के भरोसा करत हूँ । काटा के जरूरत नई ये । तोर इमान तोर संग । ये ले पचास रुपिया ।“ सेठ ने बंडी के जेब मे हाथ डालकर पचास रुपये निकाल कर सोहन को थमा दिया । पैसे मिलते ही सोहन साईकिल उठाकर फ़ुर्र हो गया ।

बिसहिन का बेटा छोटू, अपने स्कूल के दोस्तों के साथ केचप फ़ैक्टरी की दीवार फ़ांद कर अंदर कूद गया । बिल्डिंग मे तो ताला था । यहां चौकीदार चौबीसों घंटे रहता है इस लिये जोखिम लेना ठीक नहीं । बड़ी मुश्किल से उन्हे दो चार टमाटर बाहर फ़ेके हुये मिल गये । वास्तव मे चौकीदार हर रोज़ कोल्ड स्टोर से खराब होरहे टमाटर छांट कर फ़ेंक दिया करता था । वे टमाटर बहुत बुरी दशा मे थे । लेकिन स्कूल के बच्चे के लिये तो यही बड़ी कामयाबी थी । उन लोगों ने वे टमाटर रख लिये । लेकिन उनकी खुसुर पुसुर सुनकर चौकीदार चला आया । लेकिन वे हाथ कहां आते ? वे दीवार फ़ांद कर बाहर भाग गये और बाहर से चिल्ला चिल्ला कर चौकीदार को चुनौती देते रहे । लेकिन जब चौकीदार हार मान कर बैठ गया । वे अपनी विजय का जश्न मनाते नारे लगाते वापस लौट गये । अब छोटू ने थोड़ी देर मे आने का कहकर घर का रुख किया और दोस्त स्कूल के रास्ते पर उसका इंतेज़ार करने लगे ।

सुमति अभी अभी उठी थी और उल्टियाँ कर रही थी जब छोटू ने आवाज़ दी “चाची *पताल नाने हौं इंहा माड़े हे, ले लेबे । स्कूल जात हौं ।“ कहकर छोटू ने थैली दरवाज़े से लगे चबूतरे पर रख दी और स्कूल की तरफ़ दौड़ पड़ा । छोटू को आज अपने आप पर गर्व था कि जो काम बड़े लोग नहीं कर पाये वह उसने कर दिया । लेकिन जब सुमति बाहर आयी तो टमाटर की दशा देख उसे जोर से उबकाई आ गयी और वह वहीं बैठ कर उल्टी करने लगी । सड़े हुये टमाटरों की बदबू उसके नथूनो मे भर गयी । घर के सामने से पहटिया गांव के मवेशियों को चराने ले जा रहा था । उसने वह सारे टमाटर वहीं फ़ेंक दिये जिसे मवेशी तुरंत चट कर गये । वह वहीं निढाल हो गयी । उसकी हालत देख पहटिया (चरवाहा ) ने शोर मचाया तो सामने घर से गोमती और बिसहिन भागती आईं । सुमति को उठाकर अंदर ले गयी । उसका मुंह साफ़ किया थोड़ा सा पानी पिलाया जिसे उसने तुरंत उलटी कर दी । फ़िर उसके मूंह मे इलायची रखी और उसकी पीठ पर हाथ फ़ेरती रही जिससे उसे राहत मिली । सोहन घर से गायब था । सुमति को पता नहीं था वह कहां है । दोनो पड़ोसने सोहन पर खूब बिफ़रने लगी । बता ऐसी हालत मे छोड़कर कोई जाता है ? जब उसे मोबाईल पर फ़ोन लगाया तो उसने कहा “ए दे पँहुचगे हौं । गांव के तीर - - - “ दोनो बड़बड़ाने लगीं – एह दे अतेक बिहनियाँ गांव के बाहर कोई जाथे - - - ?”

सुमति लेटी थी । उसकी हालत कुछ सम्हल गयी थी लेकिन सड़े टमाटर की बदबू तो जैसे उसके रोम रोम मे समा गयी थी । वह बदबू जाने कहाँ से अचानक उसके नथुनो मे भर जाती और फ़िर वह उबकाई लेने लगती ।

“एह् दे तोर बर का नाने हौं ?” कहते हुये सोहन ने खुशी खुशी थैली का मुंह खोल दिया । *पताल - - - देखते ही सुमति फ़िर उल्टी करने लगी । वह्ह ज़ोर ज़ोर से चीखने लगी – “पाताल ल घर के बाहिर लेग जा - - - । मैं देख नई सकौं - - - “

सोहन के उत्साह पर पानी फ़िर गया । रात तक तो *पताल के लिये मरी जाती थी; अब क्या हुआ ? खैर, अब करे तो क्या करे ?

सुमति कह रही थी – “हड़िया म बासी माड़े आय । रात के पानी म् बुड़ोय रहंव भात ल । उही ल निकाल ले* गोंदली संग खा लेबों - - -“

अब क्या होगा ? *गोंदली, यानि प्याज तो सारी वह बेच चुका । उसी को बेच कर तो यह आधा किलो टमाटर लाया था । अब पता नहीं इसको क्या हो गया है ? वह टमाटर की थैली लेकर तुरंत बाहर भागा ।

किराना दुकान खुल चुकी थी ।

“सेठ मै जो पियाज बेचे रहेंव वो वापस चाही ।“

“लेकिन ओला तो कोचिया लेगे रे दस रुपिया किलो म् ।“

“देख न सेठ, कोचिया ह् अभी गांव ले बाहिर नई गे होही । त ओला बोल के मोर पियाज दिलादे न । आधेच् दिला दे ।“

“अईसन थोड़ी होथे रे । अईसने कोनो धंधा चलै क्या ?”

काफ़ी मिन्नत समाजत के बाद बाद सेठ, कोचिया को फ़ोन करने राज़ी हुआ- “कैसे रे लालू ? कहां है ? - - - क्या बाज़ार मे ? अरे मैने ओ प्याज़ दिया था न सवेरे - - - हां, दस रुपये - - - क्या ? - - - बीस मिले - - - तो होलसेल रेट क्या गया ? - - - तैतीस रुपये ? और चिल्लर मे - - - क्या ? - - - क्या, पचास ? इतनी जल्दी ? - - - दो तीन दिन मे सौ चले जायेगा ? - - -“

फ़िर वह सोहन से बोला “प्याज तो सब बिक गयी रे । चिल्लर मे प्याज आज पचास रुपये चली गयी है । और दो तीन दिन मे सौ चली जायेगी ।“ “सेठ तोर दुकान से देदे - - - मोर बाई ल चाहि ।“

“मोर दुकान म आय त् बेचे के आय । आज पचास रुपिया किलो के रेट आय । बता कितना देना है ।“ सेठ ने कहा ।

सोहन ठगा सा खड़ा रह गया । कुछ नहीं बोल सका । उसे लगा अभी रो देगा । सेठ उसे कह रहा था- “जल्दी बता । कल परसों आयेगा तो हो सकता है; सौ रुपिया किलो मिले ।“

“ठीक है ।“ इतना ही उसके मुंह से निकला ।

“ठीक है । कितनी दे दूँ ?” सेठ ने पूछा ।

“पचास रुपैया की ।“ आत्मसमर्पण के स्वर मे सोहन बोला ।

“पैसा लाया है ।“ सेठ ने अब असली बात पूछी । वह घुटा हुआ आदमी था । हर एक की रग-रग से वाकिफ़ । उड़ते परिंदे के पर गिन लेता था । सोहन ने टमाटर की थैली आगे कर दी ।

“ये क्या है । ये तो *पताल आय रे । एकर मे काय कारहूँ ? इंहा तो कोनो खरीदार नई आय एकर ।“

“इही आय सेठ ।“ सोहन ने घिघियाते हुये कहा, “*गोंदली मोर बाई बर चाहिये ।“

“चल ठीक है । तोर बाई का मामला है तो - - - । लेकिन ये आधा किलो है इसका मै पचीस रुपिया ही दे सकता हूँ । वैसे इसमे भी मुझे घाटा ही होने वाला है ।“

सोहन ने हाथ जोड़ लिये । दस किलो के बदले आधा किलो प्याज़ लेकर सोहन भारी मन से घर पहुँचा । सुमति की नज़र बचाकर प्याज़ अपनी जगह रख दिया ।

जब खाने के समय सुमति प्याज़ निकालने गयी तो चीख पड़ी “अतेक पियाज रिहिस त कहां गे ।“

“धीर लगा । कोनो खा डारे होही ।“ वह सुमति को सान्तवना देने के लिये बोला ।

“कोन खा दिही अतेक पियाज ल ? अतेक जल्दी ?”

“बज़ार ! बाज़ार ह खादीस ओ हमर सब* गोंदली ल ।“

सुमति कुछ समझ नहीं पाई । वह मासूमियत से सोहन के चेहरा देखने लगी ।

सुमति का अगला सवाल था- “तैं चटनी बर* पताल नाने रेहस न - - - ?”

सोहन बगलें झाकने लगा ।

-----*-----

*पताल- टमाटर, गोंदली- प्याज़ (छत्तीसगढ़ी) ।

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें