Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 33, मार्च(द्वितीय), 2018



गीत -
मन मे ही रह जाती है


सुनीता काम्बोज


माँ तो रोकर के हर बात कह जाती है 
पर पिता की तो मन मे ही रह जाती है  

उनके  दिल मे क्या अरमान होते नहीं
क्या पिता जी ये सपने सन्जोते नहीं 
फर्क इतना सा है  वो बताते नहीं
या तरंगें  हमीं छू वो  पाते नहीं
पर - - 

हँसता परिवार जब साथ होते पिता 
अनकहे मन के जज्बात होते पिता 
घर का हर एक कोना महकने लगे 
लौटते घर को जब रात   होते पिता 
माँ भले हर ही तूफान सह जाती है
पर - - 

घर की मजबूत सबसे कड़ी हैं पिता 
जो न रूकती कभी वो घड़ी हैं पिता 
सारा बंधन लगें मोतियों की तरह  
जो पिरोए इन्हे वो लड़ी है पिता
पर - - 

हैं कड़क धूप मे छाँव मेरे पिता 
हैं समन्दर मे इक नाव मेरे पिता 
सबकी ही मुश्किलो का वो  हल जानते 
खुद दिखाते नहीं घाव मेरे पिता 
सब्र का बाँध माँ भी तो ढह जाती है
पर - - 

है निराशा तो आस मेरे पिता 
टूटता  जो न विश्वास मेरे पिता  
उनका ये कर्ज मुझ  पर रहेगा सदा 
आम समझो न तुम,  खास मेरे पिता
पर - - 

माँ है गर राग संगीत मेरे पिता 
माँ है उम्मीद तो जीत मेरे पिता 
माँ अगर दीप है रोशनी बन गए 
माँ है मर्यादा तो रीत मेरे पिता 
ये सुनीता की आँखे भी बह जाती है 
पर पिता ---

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें