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वर्ष: 2, अंक 33, मार्च(द्वितीय), 2018



गीत -
आज कविता रो रही है


सुनीता काम्बोज


आज कविता रो रही है
रोज गरिमा खो रही है
मंच की अश्लीलता को
देख व्याकुल हो रही है

तुम सुनो ये पीर इसकी
आँख में है नीर इसकी
आज धूमिल हो गई है
देख लो तस्वीर इसकी
ये सदा सुख बाँटती थी
आज काँटें बो रही है 
आज ---

आज ये थर्रा रही है
डूबती ही जा रही है
छंद इसके खो गए ये
छटपटाती गा रही है
ये निकल कर झोपड़े को 
अब भवन में सो रही है
आज ---

चापलूसी में फँसी है
जालसाजी में कसी है
काट दो जंजीर इसकी
क्यों सुनीता बेबसी है
स्वर्ण की ये टोकरी में, 
आज कंकर ढो रही है 
आज ---


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