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वर्ष: 2, अंक 33, मार्च(द्वितीय), 2018



कब आओगे


अर्पित ‘अदब’



मेरी नींद चुराने वाले कब आओगे।
सच बतलाओ जाने वाले कब आओगे।

जिस दिन दूरी मुझ से तुम को खल जाएगी
दूरी नज़दीकी के हाथों ढल जाएगी
ढल जाएगी उम्र विरह के गानों वाली
और मिलन की माटी तन पर मल जाएगी
मेरी बात सुनाने वाले कब आओगे।
अपनी बात छुपाने वाले कब आओगे। 
सच बतलाओ जाने वाले कब आओगे।
मेरी नींद चुराने वाले कब आओगे।

जिस दिन पहली बारिश मन का ताप हरेगी
ताप हरेगी और प्रीत का घाट भरेगी
घाट भरेगी याद तुम्हारी लाने वाला
और तुम्हारी बात हमारे साथ करेगी
ऊंचे जात घराने वाले कब आओगे।
नीचे नाम सुझाने वाले कब आओगे।
सच बतलाओ जाने वाले कब आओगे।
मेरी नींद चुराने वाले कब आओगे।

जिस दिन माँ के हाथ डायरी लगी तुम्हारी
हर पन्ने पर झलक किसी की मिली उतारी
मिली उतारी ज्यों मूरत जैसी वो सूरत
त्यों समझो मूरत मंदिर से गयी निकारी
हँसकर गीत सुनाने वाले कब आओगे।
रोकर गीत मिटाने वाले कब आओगे।
सच बतलाओ जाने वाले कब आओगे।
मेरी नींद चुराने वाले कब आओगे।

किसी बहाने दिन भर तेरा नाम सुनेगी
जाग जागकर आंख भिगोये रात गिनेगी
रात गिनेगी दिन भर धूप सेंकने वाली
धूप सेंककर फिर स्वेटर में शाम बुनेगी
मुझे देख शर्माने वाले कब आओगे।
देख देख हर्षाने वाले कब आओगे।
सच बतलाओ जाने वाले कब आओगे।
मेरी नींद चुराने वाले कब आओगे।

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