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वर्ष: 2, अंक 33, मार्च(द्वितीय), 2018



हँसकर जाओ विदा तुम्हें है


अर्पित ‘अदब’



आहें आंसू रस्में कसमें
बंधन भी लो हम ने थामे
लांछन सारे सह लेंगें और
सुन लेंगें जग के भी ताने
मेरे हिस्से का भी सब कुछ
झोली भर भर मिला तुम्हें है,
हंसकर जाओ विदा तुम्हें है...

नए बहाने फिर कह लोगी
जिनको हंसकर मैं सुन लूंगा
बिछड़ गयीं तो रिश्ते नाते
नए सिरे से फिर बुन लूंगा
शायद भूल गयी हो तुम वो
महका महका प्रेम पत्र जो
कॉलेज के उस बंद गेट पर
तुमने छुप के मुझे दिया था
मैंने कल भी नाम तुम्हारे
सब से छुपकर पत्र लिखा था
वैसा ही एक पत्र आज भी
बिना नाम के लिखा तुम्हें है
हंसकर जाओ विदा तुम्हें है...

प्रश्न करूँ तो कहती हो के
मुझ को पाकर क्या पाओगे
तुम बस मेरे प्रेम में शायद
गीत लुटाते रह जाओगे
याद करो परिणाम का वो दिन
जब कम नम्बर आने पर तुम
माँ बाबा की डांट को सुनकर
मुझ से मिलकर रो बैठी थीं
काँधें पर सर रखकर मेरे
खुद को जैसे खो बैठी थीं
आज भी सारे परिणामों का
तुम को सारा श्रेय सौंपकर
मैंने अपनी अभिलाषा से
हर उत्तर में सुना तुम्हें है
हंसकर जाओ विदा तुम्हें है...

आज भी क्या उन दिनों के जैसे
गुरुवार को व्रत करती हो
पीला सूट पहनकर तुम क्या
मंदिर जाने को सजती हो
मैं तो हूँ एक कवि अभागा
किस्मत के हाथों का मारा
प्राणप्रिय मैं तुम्हें हारकर
केवल जग को जीत रहा हूँ
बाहर-बाहर भरा हुआ हूँ
भीतर भीतर रीत रहा हूँ
धन्य तुम्ही हो मुझे भुलाकर
जीवन की शर्तों को त्यागे
एक बार फिर प्रणयदेव ने
प्रेम निमंत्रण दिया तुम्हें है
हंसकर जाओ विदा तुम्हें है...

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