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वर्ष: 2, अंक 33, मार्च(द्वितीय), 2018



रात भाती है मुझे


शरद तैलंग



दिन से ज़्यादा इसलिये ही रात भाती है मुझे,
मेरी दादी बैठकर क़िस्से सुनाती है मुझे ।

भूलने की जब भी कोशिश, मैं तुम्हे करने लगूं,
याद की ख़ुशबू तुम्हारे पास लाती है मुझे ।

वो लता मंगेशकर से भी लगे सुर में अधिक,
जब मेरी माँ लोरियाँ गाकर सुलाती है मुझे ।

है कुआँ इस ओर तो खाई भी है दूजी तरफ़ ,
ज़िन्दगी ऐसी भी राहों पर चलाती है मुझे ।

चाँद ने सूरज से पूछा- रोज़ का चक्कर ये क्यूँ ?,
तब कहा सूरज ने ' ये धरती लुभाती है मुझे ।

जो भी दिन गुज़रे हैँ वो फिर लौटकर आते नहीँ,
बस यही इक बात रह रह्कर सताती है मुझे ।

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