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वर्ष: 2, अंक 33, मार्च(द्वितीय), 2018



दिल वहीं छोड़कर चले आये


डॉ. दिनेश त्रिपाठी ‘शम्स’


 
दिल वहीं छोड़कर चले आये ,
रूठकर हाँ मगर चले आये |

हमको बाज़ार मुहँ चिढ़ाता था ,
जेब खाली थी, घर चले आये |

लोग झण्डों के साथ आये हैं ,
और हम ले के सर चले आये |

ख़्वाब आँखों में आये मुट्ठी भर ,
साथ में कितने डर चले आये |

अपनी मंज़िल तो ये नहीं लगती ,
हम ये आखिर किधर चले आये |

हम बुलाते रहे उन्हें लेकिन ,
कुछ अगर कुछ मगर चले आये |

ज़िन्दगी की कठिन परीक्षा में ,
शम्स पा के सिफ़र चले आये |

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