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वर्ष: 2, अंक 32,  मार्च(प्रथम), 2018


समीक्ष्य कृति-दहलीज़ (लघुकथा संग्रह)

लघुकथाकार- रचना गौड़ ‘भारती’

प्रथम संस्करण- 2017

मूल्य-150 रू

प्रकाशक- वाङमय प्रकाशन

समीक्षक- प्रो0(डा0) शरद नारायण खरे, विभागाध्यक्ष इतिहास, शासकीय जे0एम0सी0 महिला महाविद्यालय, मण्डला (म0प्र0)-481661 वर्तमान में विसंगतियों विदू्रपताओं, नकारात्मकताओं, प्रतिकूलताओं, विडंबनाओं, व व्याप्त रूग्णताओं पर सशक्त प्रहार करने में जिस विधा का सर्वाधिक सार्थक प्रयोग किया जा रहा है उसका नाम है- ‘लघुकथा’। लघुकथा -अर्थात् शब्द सीमित पर मारक क्षमता असीमित।

वस्तुतः अल्प शब्दों में गहन व सारगर्भित संदेश देने व विकारों पर चोट करने का सामथ्र्य केवल लघुकथा के पास ही है। जो वर्तमान में स्वतंत्र विधा का रूप ले चुकी है। इसे ‘छोटी कहानी’ समझना त्रुटिपूर्ण ही होगा, क्योंकि शिल्प, कथ्य, शब्द-संयोजन व प्रस्तुति की दृष्टि से लघुकथा का अपना स्वतंत्र अस्तित्व है, जिसमें तीक्ष्णता भी होती है,सामयिकता भी और एक अनुशासन भी। सरसता व हृदयग्रह्यता तो लघुकथा में निश्चित रूप से होती ही है।

जब हम आज की सशक्त लघुकथाकार रचना गौड़ भारती जी की लघुकथाओं की समीक्षा करते हैं तो हमें लघुकथा की समग्रता के वास्तविक रूप में दर्शन होते हैं। पैनापन, तीखापन, व्यंग्य शैली, सुसंस्कृतता, सहजता, स्वाभाविकता, व्यवहारिकता, करारापन, आवेश आक्रोश, उद्विग्नता, सौम्यता, संतुलन, अनुशासन, शिल्प सौष्ठव, सम्प्रेष्णीयता, ऊर्जस्विता, ओजिस्वता व रोचकता सभी कुछ हमें ‘दहलीज़’ की 80 लघुकथाओं में दृष्टिगत होता है। आज कृत्रिमता का दौर है, असलियत नज़र ही नहीं आती है। आज का परिवेश छद्मता से परिपूर्ण है , अतएव आवश्यक है कि साफगोई के साथ सच्चाई का खुलासा किया जाए। और यह कार्य रचना जी ने अत्यन्त कुशलता, प्रवीणता व विशिष्टता के साथ अपनी लघुकथाओं के माध्यम से किया है। उन्होनें साहस के साथ अनेक चेहरों से मुखौटे उतारे हैं। उनकी लघुकथाओं में श्रद्धा, विश्वास, संस्कार, चेतना, व दिव्यता सभी कुछ समाहित है। संवेदना के भाव व्यापकता के साथ विद्यमान है। वे मर्मस्पर्शिता के साथ लिखतीं हैं, पर उनमें दृढ़ता विद्यमान है। वे रूग्णताओं व बुराईयों पर करारी चोट अवश्य करती हैं, पर वे निराशावादी कदापि भी नहीं है। उनकी लघुकथाएं साहित्य जगत के लिए एक वरदान है।

यह यथार्थ है कि रचना जी अभी वयानुसार युवा ही हैं, पर अनुभव व लेखन में वे चरिपक्व हैं। उनकी कलम में पैनापन है। वे मौलिक हैं तो असाधारण अनुपम भी। आत्मानुशील, सुसंस्कृत व दिव्य दृष्टा रचना जी बिना लाग लपेट के सच्चा व खरा लिखतीं हैं। इसलिए उनकी लघुकथाओं में एक चोखापन नज़र आता है। उनकी लघुकथाओं में एक आंतरिक शुचिता, निष्कपटता व सात्विकता दृष्टिगत होती है जो कि उन्हें व उनकी लघुकथाओं को खास बनाती है। मिठास, डिमाण्ड, आवरण, दर्द का पेशा, त्रिया-चरित्र, भ्रम, बलि का बकरा, बहु-चुनाव, दरकते रिश्ते, अहसास, महानता, बदलते अनुपात, होलिका दहन, चटरपुलाव, जैसी अति उत्कृष्ट लघुकथाओं ने इस कृति को ‘लाजवाब’ बना दिया है। वैसे तो सभी लघुकथाएं विशेष हैं पर कुछ लघुकथाओं में तो रचना जी ने कमाल ही कर दिया है। यदि उन्हें ‘लघुकथा-साम्राज्ञी’ कहा जाए तो कदापि अनुचित न होगा। निश्चित रूप से ‘दहलीज़’ की लघुकथाएं अपने युग का प्रतिनिधित्व करती हैं और अपने परिवेश को प्रतिबिम्बित करती है। उनके पास तीसरा नेत्र भी है जो समाज का सूक्ष्मता से मुआयना कर उन्हें कथ्य, विषय प्रदान करता है। वे युवा पीढ़ी की ऐसी सशक्त प्रतिनिधि हैं, जिनसे साहित्य जगत को व्यापक रूप में आशाएं हैं। अपनी बात को कहने में वे मुखर हैं और निर्भीक भी। कहीं भी वे समझौता करती दृष्टिगोचर नहीं होती हैं। वे भावों की धरा पर दृढ़ता के साथ खड़ी दिखाई देती हैं। विषयों की विविधता, व्यापकता व प्रस्तुति की गुणवत्ता प्रभावित करती है। वर्तमान में सपाटबयानी, आत्मकथ्य, संस्मरण हास्य वृतान्त के रूप में प्रायः लघुकथाएं लिखी जा रही हैं, जिससे लघुकथा की अवमानना तो हो ही रही है उसके स्तर में भी न्यूवता, पतन का समावेश हो रहा है जो लघुकथा की आभा को निश्चित रूप से धूमिल कर रहा है। पर रचना जी एक समर्थ लघुकथाकारा बनकर उभरी हैं जो ‘लघुकथा’ के भविष्य व स्तर दोनों को ही संवारती दिखती हैं। इसीलिए उनका सृजन प्रणम्य है। वे अभिनन्दनीय हैं और उनकी रचनाधर्मिता भी श्लाघनीय है।

रचना जी का लेखन कैनवास विराट है। यही कारण है कि समाज, देश, मानव, व्यवहार, लोक, जीवन शैली , आचार-विचार, मानवीय- प्रकृति, पर्व, त्यौहार, छल-कपट, बिखराव, पतन, प्रायः समस्त स्थितियों पर रचना जी ने लघुकथाएं गढ़ी हैं। मेरी मान्यता है कि ‘दहलीज़’ की लघुकथाएं निश्चित रूप से ताज़ी बयार के समान है,ं जो पाठकों को सुखद-मधुर अहसास तो प्रदान करेगी ही ,साथ ही सारस्वत कोष को समृद्ध करने में भी अपनी महत्ती भूमिका का निर्वाह करेगी। मैं रचना गौड़ भारती जी के प्रखर सारस्वत आगत व यश-अर्चन की कामना करता हूं। अंत में सही कहूंगा कि -

‘‘निष्ठा ले, रचना करें, रचना जी क्या खूब।
हर रचना पावन बने, जैसे पूजा-दूब।।’’


प्रो0(डा0) शरद नारायण खरे,
विभागाध्यक्ष इतिहास,
शासकीय जे0एम0सी0 महिला महाविद्यालय,
मण्डला (म0प्र0)-481661
मो0-9425484382


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