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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



बात कब होगी!!!


कविता "किरण"


 


व्हाट्स अप खोलते ही 
मोबाइल की स्क्रीन पर जब उसका
यह मैसेज फ्लैश होता है..
तो होंठों पर आ जाती है
अनायास ही एक हल्की सी मुस्कुराहट

मेरी लम्बी ख़ामोशी से 
झाँकती है 
उसके भीतर की बैचेनी 
इन तीन लफ़्ज़ों में 
साफ़ साफ़

झलकता है इन तीन लफ़्ज़ों में 
एक ऐसा खौफ़ 
जो मुझे खो देने के डर से उसे 
हमेशा सताता रहता है

मैं देख पाती हूँ साफ़ साफ़ 
उसके मोबाइल पर
अपने नाम और नंबर पर
डायल के लिए फिसलती हुई उसकी उंगलियां 

लेकिन....
जान बूझकर कर देती हूँ इग्नोर...

देखकर भी कर देती हूँ अनदेखा 
इसलिए
ताकि उसके मूक प्रेम को 
और मुखर होने का अवसर न मिल सके..

एक पत्थर को पिघलाने की
उसकी अनवरत अनथक कोशिशें
भर देती हैं मेरे भीतर एक झुंझलाहट

उसे दोस्ती नहीं समझ आती 
और मुझे प्रेम

पर इधर कई दिनों से
ख़ामोश है उसका इनबॉक्स

"लंच किया"?
"डिनर हुआ"? 
तबियत तो ठीक है न!

न ऐसे कोई मेेसेजेस 
न कोई इसरार
न इज़हार
न तक़रार..
मुझे लगभग जिनकी 
आदत पड़ चुकी थी...

रह रहकर
खोलकर देख लेती हूँ 
उसका इनबॉक्स 
पता नहीं क्यों...
जहाँ मेरे रिप्लाई के इंतज़ार में
पसरा हुआ होता है एक सन्नाटा..
एक उदासी..

पता नहीं कुछ अलग-सा
कुछ अजीब सा लगता है 
क्योंकि
ऐसा पहले कभी हुआ नही...

क्या हुआ होगा ...??

एक अनजाने डर और
अहसास से भरकर
मेरी उंगलियां टाइप करने लगती हैं
उसके इनबॉक्स में
पहली बार...!!!!!
"बात कब होगी!!!"


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