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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



यूँ ही दिन के उजाले जलाते रहे


डॉ० अनिल चड्डा


यूँ ही दिन के उजाले जलाते रहे,
हम रात को शमा बुझाते रहे।

महफिल से उठ चले गये थे जो,
हम दास्ताँ उन्हें सुनाते रहे ।

दिल अपना पत्थर का न था,
क्यों चोट हम इस पर खाते रहे ।

कोई तो बात थी उनकी बेवफाई में,
जो याद आ-आ के हमें सताते रहे ।

अभी तो बाकी साँसे थी घनी,
वो जनाजा समझ हमें उठाते रहे ।

 

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