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वर्ष: 2, अंक 32,  मार्च(प्रथम), 2018



वैश्विक स्तर पर हिन्दी का स्वरूप


निशा नंदिनी गुप्ता


इधर कुछ 25-30 वर्षों में आधुनिक तकनीकी के विकास के कारण आज समस्त विश्व को एक गाँव सरीका बन गया है। भूमंडलीकरण के कारण विश्व के अनेक देशों में व्यापार बढ़ा है। भूमंडलीकरण की बढ़ती रफ़तार ने बाज़ार की शक्तियों को काफी मज़बूत बना दिया है। हमारे जन जीवन में बाज़ार के इस बढ़ते दखल ने बाज़ारवाद नामक एक नई सैध्दांतिकी को जन्म दिया है। बाज़ारवाद से ही उपभोक्तावाद को बढ़ावा मिला है। भूमंडलीकरण सीधा बाज़ारवाद से जुड़ा हुआ है। बाज़ार का सीधा संबंध भाषा से है। बाज़ार में ही भाषा के रूप बनते बिगड़ते हैं और कालांतर में स्थायी हो पाते हैं।आज बाज़ार ने राष्ट्रीय सीमाएँ तोड़ दी है क्योंकि प्रत्येक देश चाहता है कि उसका माल बिके और सात समुंदर पार बिके। माल बाज़ार में बिकेगा तो उत्पादन बढ़ेगा। इस भूमंडलीकृत उपभोक्ता व्यवस्था के तहत एक ओर यदि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर वस्तुओं, सेवाओं तथा संसाधनों के मुक्त आदान-प्रदान की छूट मिली है तो दूसरी ओर देश की भाषा के विकास का मार्ग भी प्रशस्त हुआ है। अब यह संबंधित भाषा पर निर्भर है कि वह किस प्रकार इन नई चुनौतियों का सामना करती है। जो भाषा जितनी उदार होगी और समय के साथ-साथ बदलती चली जाएगी वह उतनी ही लोकप्रिय होगी। उसकी जीवन क्षमता उतनी ही अधिक होगी। आज किसी भी देशी-विदेशी कंपनी को अपना कोई उत्पाद बाज़ार में उतारना होता है, तो उसकी पहली नजर हिन्दी क्षेत्र पर पड़ती है। इन्हें बखूबी पता है कि हिन्दी आम जन के साथ-साथ उपभोक्ता की भी भाषा है। परिणामस्वरूप धीरे-धीरे हिन्दी वैश्विक अथवा ग्लोबल बनती जा रही है। विश्व बाज़ार में हिन्दी यदि बिकती है और यदि उसके प्रयोक्ता है तो भूमंडलीकरण के दौर में हिन्दी का भविष्य काफी उज्ज्वल प्रतीत होता है।हिन्दी भाषा का वैश्वीकरण- भूमंडलीकरण का केन्द्रीय तत्व है।सूचना और ज्ञान का वैश्वीकरण, सर्वसुलभता वाणियीकरण और अधिक टेकनॉलॉजी आश्रित कार्यक्रमों का विकास। भूमंडलीकरण से उत्पन्न इन नई परिस्थितियों के आलोक में विश्व स्तर पर हिन्दी के प्रचार-प्रसार की आवश्यकता बढ़ गई है। हिन्दी विश्व की तीसरी सबसे बड़ी भाषा कही जाती है। लगभग एक करोड़ बीस लाख भारतीय मूल के लोग विश्व के 132 देशों में बिखरे हुए हैं। जिनमें आधे से अधिक हिन्दी से परिचित ही नहीं उसे व्यवहार में भी लाते हैं। गत पचास वर्षों में हिन्दी की शब्द संपदा का जितना विस्तार हुआ है उतना विश्व की शायद ही किसी भाषा में हुआ हो। विदेशों में हिन्दी के पठन-पाठन और प्रचार-प्रसार का कार्य हो रहा है। भारत के बाहर 165 विश्वविद्यालयों में हिन्दी के अध्ययन की व्यवस्था हैं। दूर संचार माध्यमों, फिल्मों, गीतों हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं आदि ने भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार में अपनी अहम भूमिका अदा की है।हिन्दी का व्यापक प्रयोग जन संचार माध्यमों की अनिवार्य आवश्यकता बन गई है। मुक्त बाज़ार और वैश्वीकरण के दबावों ने हिन्दी को जरूरत और माँग के अनुकूल ढालने में भूमिका निभाई है। विश्व में अब उसी भाषा को प्रधानता मिलेगी जिसका व्याकरण संगत होगा, जिसकी लिपि कम्प्यूटर की लिपि होगी। चूँकि हिन्दी भाषा का व्याकरण वैज्ञानिक आधार पर बना है इसलिए देवनागरी लिपि कम्प्यूटर यंत्र के अनुकूल है और कम्प्यूटर युग में हिन्दी सॉफ्टवेयर और ज़्यादा विकसित करने की आवश्यकता है। यहाँ तक कि देवनागरी में इंटरनेट भेजने की प्रक्रिया को तीव्र गति से विकसित करने की जरूरत है। यदि इस सूचना युग में हिन्दी कम्प्यूटीकरण में पिछड गई, तो विश्व स्तर पर हो रही भाषाई दौड़ में हिन्दी बहुत पीछे छूट जाएगी।कम्प्यूटर में हिन्दी प्रयोग की बढ़ती संभावनाओं को ध्यान में रखकर इलेक्ट्रॉनिकी विभाग ने भारतीय भाषाओं के लिए टेक्नॉलॉजी विकास नामक परियोजना के अंतर्गत कई प्रोजेक्ट शुरू किए हैं। कम्प्यूटर एवं इंटरनेट के सहारे हिन्दी शिक्षा का प्रसार तीव्र गति से होने की संभावना बढ़ गई है। वर्तमान स्थिति में वेबसाइट पर हिन्दी इलेक्ट्रॉनिक शब्दकोश उपलब्ध है। इसी तरह अंग्रेजी तथा भारतीय भाषाओं में पारस्परिक अनुवाद प्राप्त करने की सुविधा भी उपलब्ध है। सूचना प्रौद्योगिकी में हिन्दी भाषा का प्रचलन धीरे-धीरे बढ़ रहा है। कई विदेशी कंपनियों ने अपनी वेबसाइट पर हिन्दी भाषा को स्थान दिया है।

भाषाओं की फिल्में हिन्दी में डब की जा रही है। आज टेक्नॉलॉजी की भाषा को आम आदमी के नज़दीक पहुँचाने की आवश्यकता बढ़ गई है। हिन्दी में भी कम्प्यूटर शब्दावली के निर्माण में हमें मार्केट और प्रयोक्ता को ध्यान में रखना होगा।बाज़ारवाद का हिन्दी भाषा पर बुरा प्रभाव: बाजार के वैश्वीकरण से जहाँ हिन्दी भाषा के दिन फिरते नजर आ रहे हैं वही इसकी प्रकृति में विकृत लक्षण भी दृष्टिगोचर हो रहे हैं। मनोरंजन के नाम पर फूहड़पन से भरपूर भाषा का प्रयोग भी बढ़ता जा रहा है। जनसंचार माध्यम आज जिस भाषा का प्रयोग हिन्दी में कर रहे हैं वह आलोचक के अनुसार हिंग्लिश है। यानि हिन्दी भाषा में अंग्रेजी शब्दों की अंधाधुंध भरमार है। अगर मीडिया की वर्तमान भाषा पर नजर डाले तो भविष्य के संकट का अनुमान लगाया जा सकता है। यह खतरा सांस्कृतिक है और इससे आगे जाकर सामाजिक। मनोरंजन और व्यवसाय की नकली जरूरतों से गढ़ी जा रही यह भाषा गहरे अर्थ संप्रेषणों से मुक्त की जा रही है या हो रही है। यानि वह भाषा तैयार हो रही है जिसमें मज़ाक तो किया जा सकता है मगर गंभीर चिंतन-मनन नहीं किया जा सकता। हिन्दी की यह छवि स्थापित हो रही है कि यह न तो आधुनिक विज्ञान की भाषा है और न विचार-विमर्श की। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में नई-नई तकनीकों के आने और सैकड़ों टीवी चैनलों के कारण जो कुछ दिखाया जा रहा है वह हमारी संस्कृति को प्रदूषित करके भावी पीढ़ी को दिशाहीन कर रहा है।वैश्वीकरण एवं बाजारीकरण के दौर में टेक्नॉलॉजी की भाषा को आम आदमी तक पहुँचाने की आवश्यकता है। कम्प्यूटर के अनुप्रयोंगों को विश्व मार्केट में स्वीकार्य बनाया जाए। हालाँकि हिन्दी में कम्प्यूटर शब्दावली के निर्माण में प्रयास किए जा रहे हैं फिर भी अभी भी हिन्दी तकनीकि दृष्टि से पूरी तरह विकसित नहीं है। विश्वस्तर के कई सॉफ्टवेयरो में अभी तक हिन्दी का समावेश नहीं किया गया है। आज इंटरनेट की 83 प्रतिशत सामग्री अंग्रेजी में उपलब्ध है। भारत के लिए आवश्यक है कि इंटरनेट की कथ्यसामग्री लोगों तक हिन्दी एवं भारतीय भाषाओं के माध्यम से पहुँचे। नये आविष्कारों और प्रौद्योगिकी से अपने को जोड़े रखे और नयी तकनीकी को हिन्दी सहित भारतीय भाषाओं में विकसित करें। आज हम भूमंडलीकरण के दौर में गुजर रहे हैं जहाँ व्यापार, उदारीकरण, बाजारीकरण, निजीकरण तथा उपभोक्तावादी संस्कृति धड़ल्ले से आगे बढ़ रही है और स्थानीय देसी तथा मौलिक संस्कृति को चुनौती दे रही है, ऐसी परिस्थिति में भारतीय संस्कृति एवं अस्मिता के प्रतीक के रूप में हिन्दी भाषा का संरक्षण आवश्यक है अन्यथा हमारी हजारों वर्ष पुरानी संस्कृति लुप्त हो जाएगी। हिन्दी भाषा को भूंडलीकरण के सामान्य परिवेश में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका को ध्यान में रखकर विकास के पथ पर इस प्रकार बढ़ाना है जिससे कि उसकी संस्कृति भी सुरक्षित रहे तथा वैश्वीकरण एवं बाजारवाद के दौर में हर प्रकार की चुनौतियों का सामना करने के लिए सक्षम हो।


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