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वर्ष: 2, अंक 32,  मार्च(प्रथम), 2018



आ गयी महाशिवरात्रि-पधारिए शंकरजी


गोवर्धन यादव


महाशिवरात्रि का अर्थ वह रात्रि है जिसका शिवतत्व के साथ घनिष्ट सम्बन्ध है. भगवान शिव कि अतिप्रिय रात्रि को “शिवरात्रि” कहा गया है.

शिवार्चन और जागरण ही इस व्रत की विशेषता है. इसमें रात्रि भर जागरण एवं शिवाभिषेक का विधान है.

श्री पार्वतीजी की जिज्ञासा पर भगवान शिवजी ने बतलाया कि फ़ाल्गुन कृष्णपक्ष की चतुर्दशी शिवरात्रि कहलाती है. जो इस दिन उपवास करता है, वह मुझे प्रसन्न कर लेता है. मैं अभिषेक, वस्त्र, धूप, अर्चन तथा पुष्पादिसमार्पण से उतना प्रसन्न नहीं होता जितना कि व्रतोपवास से.

ईशानसंहिता में बतलाया गया है कि फ़ाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि को आदिदेव श्री शिव करोडॊं सूर्यों के समान प्रभावाले लिंगरुप में प्रकट हुए.

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार फ़ाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी तिथि में चन्द्रमा सूर्य के समीप होता है. अतः वही समय जीवनरुपी चन्द्रमा का शिवरुपी सूर्य के साथ योग-मिलन होता है. अतः इस चतुर्दशी को शिवपूजा करने से अभीष्टतम पदार्थ की प्राप्ति होती है. यही शिवरात्रि का रहस्य है.

महाशिवरात्रि का पर्व परमात्मा शिव के दिव्य अवतरण का मंगलसूचक है. उनके निराकार से साकाररुप में अवतरण की रात्रि ही “शिवरात्रि” कहलाती है. वे हमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सरादि विकारों से मुक्त करके, परम सुख, शांति, ऎश्वर्यादि प्रदान करते हैं.

चार प्रहर पूजा का विधान

चार प्रहर में चार बार पूजा का विधान है. इसमें शिवजी को पंचामृत से स्नान कराकर चन्दन, पुष्प, अक्षत, वस्त्रादि से श्रृंगार कर आरती करनी चाहिए. रात्रि भर जागरण तथा पंचाक्षर-मंत्र का जप करना चाहिए. रुद्राभिषेक, रुद्राष्टाध्यायी तथा रुद्रीपाठ का भी विधान है.

शिवरात्रि के महत्व को प्रतिपादित करने वाली दो कथाएं पढने को मिलती है,जिसमें शिवरात्रि के रहस्य को जाना जा सकता है.

ईशानसंहिता के अनुसार--सारी सृष्टि का निर्माण कर चुकने के बाद ब्रह्माजी को घमंड उत्पन्न हो गया और वे अपने को सर्वश्रेष्ठ समझने लगे. वे चाहते थे कि कोई उनके इस कार्य की प्रसंशा करे. घूमते-घूमते वे क्षीरसागर जा पहुँचे जहाँ भगवान विष्णु विश्राम कर रहे थे. उन्हे ब्रह्माजी के आगमन का पता ही नहीं चला. ब्रह्माजी को लगा कि विष्णु जानबूझकर उनकी उपेक्षा कर रहे हैं. अब उनके क्रोध का पारावार बढने लगा था. उन्होंने अत्यन्त क्रोधित होते हुए श्री विष्णु के समीप जाकर कहा-“ उठॊ...तुम जानते नहीं कि मैं कौन हूँ.....मैं सृष्टि का निर्माता ब्रह्मा तुम्हारे सामने खडा हूँ”

श्रीविष्णु ने जागते हुए उनसे बैठने का अनुरोध किया, लेकिन ब्रह्माजी तो क्रोध में भरे हुए थे. झल्लाते हुए उन्होंने कहा-“मैं तुम्हारा रक्षक, जगत का पितामह हूँ. तुमको मेरा सम्मान करना चाहिए.” बात छोटी सी थी लेकिन वाकयुद्ध अब सचमुच के युद्ध में तबदिल हो चुका था. ब्रह्माजी ने “पाशुपत” और श्री विष्णु ने “माहेश्वर” अस्त्र उठा लिया. दिशाएँ अस्त्रों के तेजसे जालने लगी. सृष्टि में प्रलय की आशंका हो गई. देवगण भागते हुए कैलाश पर्वत पर भगवान विश्वनाथ के पास पहुँचे और इस युद्द को रोकने के प्रार्थना करने लगे. देवताओं की प्रार्थना सुनते ही भगवान शिव दोनो के मध्य में अनादि, अनन्त-ज्योतिर्मय स्तम्भ के रुप में प्रकट हुए. उनके प्रकट होते ही दोनो दिव्यास्त्र शांत होकर उसी ज्योतिर्लिंग में लीन हो गए. तब जाकर ब्रह्माजी को अपनी गलती का अहसास हुआ. श्री विष्णु और ब्रह्माजी ने उस ज्योतिर्लिंग की पूजा-अर्चना की और अपने कृत्य के लिए क्षमा मांगी.

यह लिंग निष्कल ब्रह्म, निराकार ब्रह्म का प्रतीक है. यह लिंग फ़ाल्गुन ‍कृष्ण चतुर्दशी को प्रकट हुआ,तभी से आजतक लिंगपूजा निरन्तर चली आ रही है

शिवपुराण के अनुसार एक कथा आती है-

गुरुद्रुह नामक एक भील वाराणसी के वन में रहता था. वह अत्यन्त ही बलवान और क्रूर था. अतः प्रतिदिन वन में जाकर मृगों को मारता. वहीं रहकर नाना प्रकार की चोरियां भी करता था.

प्रतिदिन की भांति वह वन में जाकर अपने शिकार की तलाश कर रहा था. लेकिन दुर्भाग्य से उसे उस दिन एक भी शिकार नहीं मिला. भटकते-भटकते वह काफ़ी दूर चला आया था. शाम भी घिर आयी थी. अतः उसने किसी पॆड पर बैठकर रात्रि विश्राम करना उचित समझा. वह एक पेड पर जा चढा. संयोग से वह पेड “बिल्व-पत्र”का था. नींद कोसों दूर थी. पेड की डाल पर बैठे-बैठे वह पत्तियाँ तोड-तॊडकर नीचे गिराने लगा. ऎसा करते हुए तीन प्रहर बीत गए. चौथे प्रहर में भी उसकी यह हरकत जारी रही. वह बेल-पत्र तोडता जाता और उसे नीचे गिरा देता.

रात भर शिकार की चिन्ता में व्याध निर्जल, भोजनराहित जागरण करता रहा था. वह यह नहीं जानता था कि उस बिल्व-पत्र वृक्ष के नीचे शिवलिंग स्थापित है. इस तरह उसकी चारों प्रहर की पूजा अनजाने में स्वतः ही हो गई. उस दिन महाशिवरात्रि थी. भगवान शिव उसके सामने प्रकट हो गए और उससे वर मांगने को कहा. “मैंने सब कुछ पा लिया” यह कहते हुए वह व्याध उनके चरणॊं में गिर पडा. शिव ने प्रसन्न होकर उसका नाम “गुह” रख दिया और वरदान द्दिया कि भगवान राम एक दिन अवश्य ही तुम्हारे घर पधारेंगे और तुम्हारे साथ मित्रता करेंगे. तुम मोक्ष प्राप्त करोगे, वही व्याध शृंग्वेरपुर में निषाद्रराज “:गुह” बना,जिसने भगवान राम का आतिथ्य किया.

यह महाशिवरात्रि “व्रतराज” के नाम से भी विख्यात है. यह शिवरात्रि यमराज के शासन को मिटानेवाली है और शिवलोक को देने वाली है. शास्त्रोक्त विधि से जो इसका जागरणसहित उपवास करते हैं उन्हें मोक्ष की प्राप्त होती है. इसके करने मात्र से सब पापों का क्षय हो जाता है.


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