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वर्ष: 2, अंक 32,  मार्च(प्रथम), 2018



बचाने होंगें भारतीय संस्कृति के रंग
होली : मस्ती , मर्यादा और रंग


घनश्याम बादल


अपनेपन व खुशी के रंगों से सराबोर करने की परम्परा का दूसरा नाम है होली । सही मायनों में समझें तो होली केवल रंग बिखेरने या गुलाल लगा देने भर का त्यौहार नहीं वरन् वह मन में कितने भी गहरे में पल रहे रंजिषों व वैर के भाव को धो डालने वाला पर्व है । ऐसा पर्व जो ऊंच नीच बड़े - छोटे, अपने- पराए ,शूद्र या सवर्ण सबके अंतर को धो डालता है । यदि ऐसे हम होली मनाते हैं तो वह अंग्रजी का ‘होली ’ यानि पावन पर्व बन जाता वरना तो बस परंपरा निवर्हण रह जाता है ।

यह कैसी होली !:

एक निगाह डालिए अपने चारों तरफ क्या सच में हम राग , अनुराग और प्रेम की होली मना रहे हैं ? क्या किसी भी तरह से हम मिथकों में वर्णित प्रहलाद रूपी भक्ति व भलाई को जला देने के लिए अपने वरदान का दुरूपयोग करने वाली होलिका का दहन मन से कर पा रहे हैं ? क्या आज पुराने बैर भाव को जलाने की बजाय होली बदला लेने या नषा करने का बहाना नहीं बनती जा रही है ? सच में क्या हम चाहते हैं कोई पड़ौसी या अजनबी हमारे घर होली पर आए ? हमारी बहनों , भाभियों या बहू बेटियों के साथ रंग खेले , उनके गालों पर गुलाल मले ? षायद नहीं । अब नहीं क्यों ? इसका जवाब भी हम जानते ही हैं । अगर होली को सच में ‘होली भाव’ यानि पावनता से से मनाने की मानसिकता हम विकसित करलें तो बहुत सी अनैतिकता की बीमारियां तो स्वयमेव ही जल जाएंगी ।

होली संस्कृति और प्रकृति:

अब होली जैसे रंग , मस्ती और प्रेम के पर्व यूं ही नहीं बनाए गए थे हमारी संस्कृति में पर्व हमें अपनों और प्रकृति के समीप लाने का मौका देते थे । अब सोचिए होली हम चैत में ही क्यों मनाते हैं ? ऐसा इसलिए क्योंकि बसंत काम भाव जगा कर प्रेम के रंग बिखेरता है और फागुन आ कर उमंग भर देता है तन मन में । दरअसल होली के पर्व को मनाने के लिये सबसे बड़ा कारण रहा है वसंत ऋतु का आगमन । एक वसंत मौसम के अनुसार आता है और दूसरा खुषियों का दूसरा नाम है ।गौर करें हम रंग खुद को नहीं अपितु दूसरे को ही लगाते हैं प्रतीक रूप में यही रंग खुशी है , आनंद हैं तो होली तो तभी मनती है जब हम दूसरों को खुशी के रंग लगा सकें ।

होली मतलब सहकार व खुशियां:

थोडा़ पीछे जाकर देखिए होली के पर्व से करीब सवा महीने पहले वसंत पंचमी को होली का उपला रख दिया जाता था यानि एक बार फिर , प्रतीक रूप में खुशी भी अनायास नहीं क्रमागत आनी चाहिए । फिर गांव गलियों में मस्तों की टोलियां ‘फगवा’‘कामण’ या ‘धमाल’ गाते हुए घर घर जाती और होली का ईंधन इकट्ठा करती थी इसका भी एक सबब था सबका सहयोग लेना सबका योगदान पाना और इकट्ठे होकर मन के सारे पापों , गिले षिकवों को होली की आग में जला डालना होता था तब होली का मतलब । आज क्या है सोच सकें तो सोचें ।

अहा ! वह होली:

चलिए सन् चालीस , पचास या साठ के दषक की होली की एक झलक की कल्पना करें फगवा के गीतों के नाम पर कितनी गालियां बरसती थी तब पर कोई बुरा नहीं मानता था । क्या अब ऐसा संभव है ? नहीं तो क्यों ? क्योंकि तब गालियां प्रेम पगी होती थी मन के साफ गगंाजल से नहा कर आती थी उनमें खुन्नस या किसी के अपमान का भाव नहीं , अपनापन था । और होली के नाम पर आज ‘ताक’ है मौका है किसी की इज्जत से खेलने का । इस गंदे भाव को हम हटा , धो पाएं तो आज की होली भी पावन व गंगाजल स्नात होली न हो जाए !

पूरा देश होली विशेष:

अलग प्रदेशों में अलग अलग ढंग से होली आधार की स्थापना की जाती है पश्चिमी उत्तरप्रदेश में पांच उपले रख कर तो राजस्थान के जयपुर , सीकर , चुरु व झुंझुनूं सहित शेखावाटी में एक मोटा डण्डा गाड़ कर प्रहलाद के रूप में होलिका का आधार रखा जाता है और फिर प्रतिदिन सवा महिने तक दिन ईंधन जमा करके लोकगीत व नृत्य ‘‘गींदड़’’ डाले जाते हैं डांडिया रास से मिलता जुलता नृत्य और मुंह में दो अलगोजे लेकर जब वातावरण में मधुर स्वर लहरी गूंजती है तो पूरा वातावरण ही सरस हो उठता है ।

बिखरे रंग अनेक:

वैसे ऐसा भी नहीं है कि होली के नाम पर बस गंदगी ही गंदगी हो आज भी कुछ सांस्कृतिक रूप से समृद्ध इलाकों में वहां के लोग होलिका के पर्व की महत्ता को जानते हैं यही वजह है कि आज भी बृज की लठ्ठमार होली , बस्तर की पत्थरमार होली , हरियाणा की कोड़ामार होली, राजस्थान की गाढ़े गुलाबी रंग की ‘गैर’ ,मथुरा की राधाकृष्ण होली व पंजाब के होला महला का रंग आज भी सर चढ़़कर बोलते देख जा सकता है और वातावरण में इस भागमभाग व आपाधापी के बावजूद ‘‘ होली आई रे कन्हाई , रंग बरसे बजा दे तोरी बांसुरी ... जैसे सुमधुर गीत सुनाई देते हैं

जला डालो मनोविकार:

होली जहां एक और मनोविकारों के दहन का पर्व माना जाता है वहीं ओझा , तांत्रि.क व टोने -टोटके वाले भी इस दिन अपना मायाजाल फैलाने का अवसर ढंूढ लेते हैं । कहते हैं इस दिन अपने बच्चों का खास ख्याल रखना जरुरी है क्यांकि कुछ लोग उनके बाल काट कर टोना टोटका कर सकते हैं अब इस प्रपंच में कितना सच है यह तो नहीं पता पर विज्ञान के युग में इसे अंध विष्वास ही कहा जाएगा ।

गांव की महकती होली:

उत्तर भारत के बहुत से गांवो में आज भी उल्लास के साथ न केवल होली का पूजन होता है वरन् वहां अब भी रात में होली के गीतों की गूंज व मधुरता के दर्षन हो जाते हैं ,वहां आज भी होलिका पूजन होता है, होली को सूत की डोर से बांधकर हल्दी ,बेर, बताषे आदि से पूजा जाता है और रा़ित्र में पूजा का मुहुत्र्त निकाल कर ष्षुभ लग्न में होलिका दहन किया जाता है। वहां आज भी माना जाता है कि होलिका के दहन करने से मनुष्य के सारे पाप उसकी अग्नि में जलकर राख हो जाते हैं तथा आज के ही दिन हम नए आने वाले अनाज की प्रथम आहुति अग्निदेव को अर्पित करते हैं ।

उफ् यह नज़ारा:

मगर खेद का विषय है कि होलिका के पर्व का जष्न अब पिछड़े कहे जाने वाले उन्ही अंचलों में रह गया है जहां अभी भौतिक प्रगति के पांव पूरी तरह से नहीं जमंे हैं । नहीं तो अधिकांश क्षेत्रों में तो होलिका का पर्व हो -हुल्लड़ या फिर धींगा मस्ती का पर्याय बन कर रह गया है । रंगों की जगह कैमिकल्स , गोबर कीचड़ व अन्य हानिकारक पदार्थों ने होली की गरिमा को लगातार कम किया है वहीं बढ़ती षराबखोरी , भांग व ड्रग्स का इस्तेमाल इस पावन पर्व को खराब किए जा रहा है । होली के बहाने छेड़छाछ़ व अश्लीलता पर रोक लगाने का प्रयास अगर नहीं किया गया तो होली का आनंद व पर्व दोनों ही संकट में पड़ जाएंगें ।

ज़रूरी हैं बदलाव:

अब समय के साथ बदलाव तो लाने ही होगें , ऐसे बदलाव जिससे होली की गरिमा व रंग की मस्ती दोनों बचे रहें । होली के मान , मर्यादा व मस्ती के बीच एक संतुलन बनाना होगा । फूहड़ता , अश्लीलता, बदले की भावना छेड़खानी नशेखोरी का होली से हटाना होगा । मनोविकारों का दहन यदि हम होली में कर पाएंगें तो फाग के रंग अपने आप ही निखर कर चारों ओर बिखर जाएंगें ओर तब सभ्य लोग होली के दिन घरों के दरवाजों के पीछे कैद नहीं होगें अपिुपु वें भी अपनी संसकारें की होली खेल कर मस्ती को मर्यादा के रंगों से सराबोर कर सकेंगें ।


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