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वर्ष: 2, अंक 32,  मार्च(प्रथम), 2018



तमाचा


सविता मिश्रा 'अक्षजा'


निष्ठा अपने घर के बरामदे में सहेलियों के संग बैठी थी | जब कभी मंजू तीन चार सहेलियों के साथ होती तो किसी न किसी मुद्दे पर चर्चा गरमा ही जाती थी | लेकिन जल्दी ही हँसी-ठिठोली पर आकर समाप्त हो जाती थी |

आज चाय की गर्मागर्म चुस्कियों के साथ ईमानदारी पर बातचीत हो रही थी।

गर्व पूर्वक स्नेहा ने जैसे ही बोला, "मेरे पति तो बहुत ईमानदार है |"

वैसे ही अचानक यह बातचीत एक दूसरे पर कटाक्ष में बदलने लगी |

"पति तो मेरा ईमानदार है | वह सब की तरह पद का दुरूपयोग कभी नहीं करता |" कनखियों से स्नेहा की तरफ देखकर व्यंग्यात्मक आवाज में मंजू बोली |

स्नेहा को समझते देर नहीं लगी | वह रोष भरी आवाज में बोली, " छोड़ो यार ! पद का कितना सदुरूपयोग करते हैं यह तो तेरा महल जैसा घर ही चीख--चीखकर गवाही दे देता है। मानो या न मानो ईमानदार तो मेरा ही पति है ! "

यह सुनते ही निष्ठां ने झट चुटकी ली,, "छोड़ स्नेहा यार ! मलाईदार पद और ईमानदारी!!"

स्नेहा तुनकती हुई बोली -"तुम्हारे 'वो' की तरह मेरे 'ये' पद का फायदा उठाकर मलाई ही नहीं चाटते रहते हैं। आठ घंटे कड़ी मशक्कत करते हैं ! समझी |"

"देखो भई ईमानदार तो मेरा ही पति है ! जिस कुर्सी पर है, उस कुर्सी को पाने के लिए खाने वालों की लाइन लगी रहती है | ऐसी कुर्सी पर होकर भी क्या मजाल कि एक पैसे की बेईमानी करें |" निष्ठा चाय की चुस्की लेती हुई रोष मिश्रित गर्व से बोली |

"मेमसाब' ! 'साहब' ने ये कम्बल भेजवाये हैं | कहाँ रख दूँ ?" तभी दूर से अर्दली की दबी सी आवाज आई।

"क्या जरूरत थी इनकी ?" पास जाकर निष्ठा उसी रोष में बोली।

अर्दली सकपकाकर बोला- "कोई जाड़े में बांटने के लिए चार बंडल दे गया था, 'साहब' ने कहा इन बंडलो से दस- बारह कम्बल निकालकर घर पर रख आओ |"

रामू को आवाज लगाकर कहा, " रामू इन कम्बलों को ससुरजी वाली अलमारी में रख दो |"

"एसी, टीवी कोई भेजवाता तो ....,!!" भुनभुनाती हुई बरामदे में पहुँचकर सहेलियों से बोली - "टीवी खरीदनी है मुझे | आजकल मेरे कमरे का टीवी खराब हुआ पड़ा है। कहाँ कितना भ्र्ष्टाचार फैला हुआ है, कोई खबर ही न मिल पा रही है।"

वह कुर्सी पर बैठी ही थी कि मंजू उठती हुई बोली - "मैं चलती हूँ अब निष्ठा ! मेरा भी टीवी ख़राब है, किन्तु मसालेदार खबर मिल ही जाती हैं |" खीझते हुए स्नेहा भी उठकर बोल पड़ी - सूप बोले तो बोले चलनी ..|"

निष्ठा को अपनी कुर्सी चुभने सी लगी | दोनों की बातों का जवाब नहीं बन पड़ रहा था उससे | लेकिन फिर भी ओंठ बुदबुदा उठे - "इस अर्दली के बच्चे को अभी ही आना था |"


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