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वर्ष: 2, अंक 32,  मार्च(प्रथम), 2018



खुलती गिरहें


सविता मिश्रा 'अक्षजा'


पत्नी और माँ के बीच होते झगड़े से आज़िज आकर बेटा माँ को ही नसीहतें देने लगा | सुनी-सुनाई बातों के अनुसार माँ से बोला - "बहू को बेटी बना लो मम्मा, तब खुश रहोगी |"

"बहू ! बेटी बन सकती है?" पूछ अपनी दुल्हन से |" माँ ने भौं को चढ़ाते हुए कहा |

"हाँ, क्यों नहीं ?" आश्वस्त हो, बेटा ही बोला |

"बहू तो बन नहीं पा रही, बेटी क्या खाक बन पायेगी वह |" गुस्से से माँ ने जवाब दिया |

"कहना क्या चाहती हैं आप माँजी, मैं अच्छी बहू नहीं हूँ ?" सुनते ही तमतमाई बहू कमरे से निकलकर बोली |

"बहू तो अच्छी है, पर बेटी नहीं बन सकती |"

"माँ जी, मैं बेटी भी अच्छी ही हूँ | आप ही सास से माँ नहीं बन पा रही हैं |"

"मेरे सास रूप से तुम्हारा यह हाल है, माँ बन गयी तो तुम मेरा जीना ही हराम कर देगी।" सास ने नहले पर दहला दे मारा |

"कहना क्या चाह रही हैं आप?" अब भौं तिरछी करने की बारी बहू की थी |

"अच्छा ! फिर तुम ही बताओ, मैंने तुम्हें कभी सुमी की तरह मारा, कभी डांटा, या कभी कहीं जाने से रोका !" सास ने सवाल छोड़ा |

"नहीं तो !" छोटा सा ठंडा जवाब मिला |

बेटा उन दोनों के स्वरांजली से आहत हो बालकनी में पहुँच गया |

"यहाँ तक कि मैंने तुम्हें कभी अकेले खाना बनाने के लिए भी नहीं कहा | न ही तुम्हें अच्छा-खराब बनाने पर टोका, जैसे सुमी को टोकती रहती हूँ |" उसे घूरती हुई सास बोली।

"नहीं माँ जी, नमक ज्यादा होने पर भी आप खा लेती हैं सब्जी !" आँखे नीची करके बहू बोली।

"फिर भी तुम मुझसे झगड़ती हो ! मेरे सास रूप में तो तुम्हारा ये हाल है। माँ बन, सुमी जैसा व्यवहार तुमसे किया, तो तुम तो मुझे शशिकला ही साबित कर दोगी।" बहू पर टिकी सवालिया निगाहें जवाब सुनने को उत्सुक थी।

कमरे से आती आवाजों के आरोह-अवरोह पर कान सजग थे बेटे के | चहलकदमी करता हुआ वह सूरज की लालिमा को निहार रहा था |

"बस करिए माँ ! मैं समझ गयी | मैं एक अच्छी बहू ही बन के रहूँगी|" सास के जरा करीब आकर बहू बोली।

"अच्छा !"

"मैंने ही सासू माँ नाम से अपने दिमाग में कँटीली झाड़ियाँ उगा रखी थी | सब सखियों के कड़वे अनुभवों ने उन झाड़ियों में खाद-पानी का काम किया था |"

"सुनी क्यों ! यदि सुनी भी तो गुनी क्यों ?"

बेटे ने बालकनी में पड़े गमले के पौधे में कली देखी तो उसे सूरज की किरणों की ओर सरका दिया |

"गलती हो गई माँ ! आज से उन पूर्वाग्रह रूपी झाड़ियों को नेस्तनाबूद करके, अपने दिमाग में प्यार का उपवन सजाऊँगी | आज से क्यों अभी से। अच्छा बताइए, आज क्या बनाऊं मैं, आपकी पसंद का ?" बहू ने मुस्कराकर कहा |

"दाल भरी पूरी ..! बहुत दिन हो गए खाये हुए।" कहते हुए सास की जीभ, मुँह से बाहर निकल ओंठों पर फैल गई |

धूप देख कली मुस्कराई तो, बेटे की उम्मीद जाग गयी | कमरे में आया तो दोनों के मध्य की वार्ता, अब मीठी नोंकझोक में तब्दील हो चुकी थी |

सास फिर थोड़ी आँखे तिरछी करके बोली- "बना लेगी..?"

"हाँ माँ, आप रसोई में खड़ी होकर सिखायेंगी न !!" मुस्करा के चल दी रसोई की ओर |

बेटा मुस्कराता हुआ बोला, "माँ, मैं भी खाऊँगा पूरी |"

माँ रसोई से निकल हँसती हुई बोली, "हाँ बेटा, जरुर खाना ! आखिर मेरी बिटिया बना रही है न |"

बालकनी के साथ सोंधी खुशबू से रसोई भी महक उठी |


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