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वर्ष: 2, अंक 32,  मार्च(प्रथम), 2018



वतन-बेवतन


राजीव कुमार


दूसरे वतन में सिराज शेख जैसे भाई और दोस्त को पाकर मुकद्दर मियां को कभी नहीं लगा कि बेवतन हैं।

गाहे-बगाहे वतन को याद करके मुकद्दर मियां की आंखें नम हो जातीं।

शिराज शेख उनको दावत पर बुलाते और सममझाते, “जहां तुम्हारा जनम हुआ है, वो भी तुम्हारा वतन और जहां से तुम्हारे पूरे परिवार का गुजर-बसर हो, वो भी तुम्हारा ही वतन है।”

पारिवारिक प्यार पाकर मुकद्दर मियां सब कुछ भूल जाते।

बीवी की गंभीर बीमारी की खबर सुनकर सिराज शेख को गमगीन करके मुकद्दर मियां सिर्फ इतना ही कह पाए, “सिराज मेरे भाई, अब हमारा मिलना कभी नसीब नहीं होगा, अलविदा।” सिराज शेख और मुकद्दर मियां एक-दूसरे के गले लगकर फूट-फूटकर रोए।

गंभीर बीमारी के कारण एक महीने के अंदर मुकद्दर मियां की बीवी अल्ला को प्यारी हो गई। मुकद्दर मियां को सदमा लगा, अभी इस सदमा से उबर भी नहीं पाए थे कि कलियुगी बेटे ने अपने पिता को वृद्धाश्रम में डालना चाहा। मुकद्दर मियां को दोबारा सदमा लगा।

मुकद्दर मियां आंखों में आंसू लिए इतना ही बोले, ‘‘बेटा, तू कितना नालायक है और मैं कितना बदकिस्मत।”

मुकद्दर मियां सोचने लगे कि मैं पहले बेवतन था या अब बेवतन हूं। उन्होंने अपने आप को सदमे से निकाला और अपना वतन हमेशा के लिए छोड़ दिया।

उम्मीद छोड़ चुके सिराज शेख को किस्मत ने फिर मुकद्दर मियां से मिला दिया।


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