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वर्ष: 2, अंक 32,  मार्च(प्रथम), 2018



अनजानी-सी मदद


राजीव कुमार


टी.टी. के कड़क-गुस्सैल सवाल ने बुजुर्ग महिला को अंदर तक कंपकंपा दिया था। उस बोगी के सारे यात्री तमाशबीन बने हुए थे।

टी.टी. ने कहा, अब आखिरी बार पूछता हूं, बताइए, आपने जंजीर क्यों खींची?’’

बुजुर्ग महिला ने यात्रियों की तरफ रुआंसी नजरों से देखा, जो किसी बीच-बचाव करने वाले को तलाश रही थी।

टी.टी. ने कहा, ‘‘अभी बुलाता हूं पुलिस को। आपके साथ कोई जेंट्स है कि नहीं?’’

पुलिस वाले का नाम सुनते ही वह महिला पसीना-पसीना हो गई।

टी.टी. ने जैसे ही पुलिस वाले को फोन घुमाया, तभी एक बुजुर्ग महिला पटरी की तरफ से हांफती-भागती हुई ट्रेन पर सवार हुई और टी.टी. से हाथ जोड़कर कहा, ‘‘बहुत अच्छा किया माई-बाप! मेरा पोता दूध के लिए रो रहा था। मैं दूध की तलाश में स्टेशन से बाहर निकल गई। आप अगर ट्रेन नहीं रोकते तो मैं स्टेशन पर ही छुट जाती और मेरा पोता गुम हो जाता।’’

टी.टी. ने आश्चर्यभरी नजरों से उस हांफती हुई महिला की तरफ देखा, फिर जंजीर खींचने वाली महिला की तरफ देखा और कहा, ‘‘मां जी, आप इनका धन्यवाद कीजिए, जिसने अनजाने में ही सही लेकिन आपकी बहुत बड़ी मदद की।’’

दोनों बुजुर्ग महिलाएं एक-दूसरे के गले मिलीं, तमाशबीन यात्रियों ने तालियां बजाईं। पुलिस वाले को वहीं से मोड़कर टी.टी. उनके साथ दूसरी बोगी में चला गया।


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