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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



होली के अवसर पर कवितायेँ


विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र'


 

(1)
आ जा पी ले भंग भायला होड़ी खैल्यां संग भायला ================ एक के दो दो दीखे मोकूं कैसी दे दई भंग भायला ================ तन मन दोनूं रंग जावेला मत कर मोकूं तंग भायला ================ अनूठो देवर-भाभी रिश्तो घर-घर मच रही जंग भायला ================ क्यूँ मुँह कूँ लटका बैठ्यो रे हम हैं तेरे संग भायला ================ ढ़ोल पर तू थाप दिए चल 'व्यग्र' बजाये चंग भायला ================
(2) होली पर क्षणिकाएं...
गौरी जोहवे वाट फागुन को ठाट हाट रंग-पिचकारी को छुप गयो जाने कहाँ देखें हम यहाँ दो महतारी को ****** डारूँ उनपे रंग करूं मैं तंग और वो झुँझलाये मन में मेरे बात पिचकारी साथ शायद ही बचपाये ****** गालन मलै गुलाल बिगाड़ें हाल आज दिन होरी को करें हमें परेशान बॉप बलवान बदला लें चोरी को ****** एक लगाये बात करे एक घात ब्रज की गौरी रे भोरे मेरे श्याम ललित ललाम खेलें सब होरी रे... ******
( 3)मदमाती होली रे... **********************
होली में हुड़दंग बजेगी चंग रंग की बौछारें भावज के देवर लावें घेवर लगे प्यारे-प्यारें ******** डारे सबही रंग चढ़ाँएं भंग मदमाती होली रे नारी हुई निडर चलायें मुद्गर नैनों से गोली रे ******** निखरा निखरा रूप सुबह की धूप मेरे मन को भाये नाचे मन मोर फागुन का जोर सजन घर पर आये ******* फागुन की रात निराली बात चाँदनी छिटकायें गावें गौरी गीत पुरानी रीति सजन से इठलायें *********

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