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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



अपने जीवन को बचाओ


संतोष कुमार वर्मा


         
                  
हमें नहीं काट रहे हो तुम 
काट रहे हो अपने जीबन को ,
मुझे मारकर तुम 
बुला रहे हो अपने मरण को.

मै जैसा भी हूं , तेरे 
जीवन को बचाता हूं 
हर जख्म पर तेरे,
मै दवा के काम आता  हूं। 

मेरा हर एक अंग,
तेरे जीवन को बचाए रखा 
फिर भी तू न जाने क्यूं 
मुझको मिटाने की सोचा 

मुझको काटने से बचाओ 
मैं  तेरे जीवन को बचाऊंगा 
जो सुख मिलते नहीं तुझे 
मै तुम्हे उसका हक़दार बनाऊंगा. 

मुझे बढाकर के देखो 
तेरी हर कमी पूरी होगी 
जो चाहोगे , वो मिलेगा 
हरपल होठो पर हँसी होगी। 
    

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