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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



उम्र की दहलीज़


शुचि 'भवि'


         
                  
प्यार अगर है 
तो रहेगा सदा
रहें  साथ  या 
हो जाएं जुदा
उम्र के पड़ाव 
बदलते हैं
पहले दिल-
मचलते थे
अब  शब्द-
सम्हलते हैं,,

स्पर्श वो तुम्हारा
भीतर तक
उतारता था तुम्हें-
उंगलियों के 
पोरों से
होता हुआ
दिल तक,,,
कभी तुम्हारी सांसों में
बहती थी भीतर तुम्हारे,,
माथे का चुम्बन कभी
जन्नत की सैर कराता था,,
कभी तुम्हारा नाम मात्र
चेहरा लाल कर जाता था,,

और आज
गिन रहें हैं 
हम
झुर्रियों में 
इन बीती यादों को,,

और ढूँढ रहे फिर से
अपना भूतकाल-
जो भविष्य तक 
नहीं  जाता अब
ठहर गया है न
वो भी हमारी तरह
उम्र की दहलीज़ पर,,,

    

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