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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



विश्वास


शिबू टुडू


         
 

जुग-जुग गया जग में,
भाया न किसी को यह संसार,
पता नहीं
कभी था,
कभी होंगे,
यह स्वर्ग-द्वार,
फिर भी
मानव विश्वास अपरंपार।
जन्म-जन्मान्तर से लोग,
चलते आये हैं
और
चलते जायेंगे
बिना गारंटी के
उस पथ पर,
जहाँ उन्हें है विश्वास,
स्वर्णिम स्वर्ग-द्वार को
बिन देखे
इस स्वर्ग-द्वार के गुरू,
हर मोड़ पर,
मिला करते हैं,
बात करते हैं जरूर,
स्वर्ग-नरक की,
पर अफसोस,
नदारत है सूची
इनके पास भी।
कभी-कभी सोचता हूँ,
संसार की आबादी के साथ,
कितनी भीड़ होगी 
वह पथ,
जिस पर,
स्वर्ग-नरक,
के विश्वासी
चलते जाते हैं,
निरंतर,
अटूट प्रेम और आशा के साथ ?
मुझे शिकायत है,
अतीत के,
उन इतिहासकारों,
लेखकों,,
और
बुद्धिजीवियों से,
जिनका जग में नाम है,
क्यों चूक गयी ?
आपकी लेखनी,
ऐसे लोगों की सूची लिखने में,
आपके समय अलग थे,
हमारे समय में लोग,
प्रमाण की बात करते हैं,
पहचान की बात करतें हैं,
बिना प्रमाण के बात को,
अंधविश्वास कहते हैं,लोग।

    

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