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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



जन शक्ति का सच


शिबू टुडू


         
                  
यह सच है,
कि मैं भारतीय हूँ,
यह भी सच है,
कि मैं जन हूँ,
परन्तु, 
मेरी शक्ति की गिनती 
क्या ? 
सिर्फ,
मतदान में नहीं की जाती,
क्या ?
सिर्फ,
जनगणना में नहीं की जाती।
देश को आजाद हुए,
कई साल बीत गए,
पर,
क्या ?
आज हम तथाकथित,
देश चलाने वालों के चंगुल से बच पाये हैं।
हम तो, तब भी गुलाम थे,
अब भी गुलाम है,
फर्क, सिर्फ इतना है कि
तब औरों के हाथों,
पर, अब अपनों के ही हाथों।
भारतीय संविधान लिखा गया,
ताकि जनों के अधिकारों का रक्षा हो,
पर,
हमारे हाथों से बने हुए,
हमारा वजूद मिटाने पर तुले हैं,
मुँह से काफी कुछ दे देते हैं,पर
हाथों से हमारे ही स्तन से दूध निकालते हैं,
जन की महता की अनादर होता देख,
क्यों नहीं तोड़  दूँ,
जन को,
ज और न में,
अर्थ और लगा दूँ,
ज से जीव और न से नहीं,
और लगा दूँ, अलग अर्थ,
हम जीव ही नहीं, तो 
जन-शक्ति का अस्तित्व ही कहाँ ?
    

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