Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



लंगूर बन के


सविता मिश्रा 'अक्षजा'


 	

भर उमंग मन में हम नारियाँ जहाँ फटके,
भाग जाओंगे तुम सब वहां से बन्दर बनके।

गुझियाँ पापड़ और पकवान बनाकर के,  
थक हार चुप बैठे हुड़दंग को परे धर के।

चुप्पी जो तोड़ दी हमने, रह जाओगे हक्के-बक्के,
रंग चढ़ा, तो होली खेलेंगे फिर हम खूब ही छक के।


जो मचल रहे हो यहाँ तुम सब तन-तन के,
भागोगे फिर भीगी बिल्ली सब बन-बन के।


बच्चों सी पिचकारी लिए इधर-उधर हो फिरते,
दम नहीं है किसी में रंग लगाये गाल पे मल के।

भंग के नशे में जो आ रहे हो उछल-उछल के,
भंग उतरते ही मिलोगे सारे के सारे कहीं दुबके।


होली खेलना सभी हमसे जरा संभल संभल के,
वरना सब मिलोगे फिर लाल-पीले-लंगूर बन के।     

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें