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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



हुल्लड़ होली की -


सविता मिश्रा 'अक्षजा'


 	

सड़कों पर लड़के आवारा बन घूम रहे,  
शराब के नशे में लड़को को ही चूम रहे।
सब मिलकर कैसे-कैसे जुगाड़ बना रहे,  
तिरछी नजरों से लड़कियों को ताड़ रहे।

चीथड़े- चीथड़े हो गए है उनके कपड़े, 
मुख पर वार्निश है सारे के सारे चुपड़े।
दूर से ही दिख रहे हैं बड़े ही डरावने, 
देख उन्हें लड़कियाँ लगी हैं दूर भागने।

लावारिस का गाना गाते हुए बेसुरा,
सड़क पर बेताल ही खूब झूम रहे हैं।
खेलेय गोरी का यार बलम तरसे,
गाते-इठलाते इधर-उधर घूम रहे हैं।

कोई तो लग रहे हैं लंगूर,
रंगों से खूब निखरा है नूर।
हरे, लाल, पीले रंगों से हैं सरोबार,
लजा जाते रंग डाले जब कोई नार।

होली की मस्ती सब पर ऐसी छाई, 
पी गए भांग भी लोग और लुगाई।
झूम-झूम कर सारे ही लोटपोट हो रहे हैं,
हँस-हँसकर एक दूजे को रंग पोत रहे हैं।

कभी खड़े हो रहे हैं खूब तन कर,  
कभी धराशायी हुए हैं पंगु बन कर। 

होली के हुल्लड़ में बूढ़े पर भी,
देखो इसबार जवानी ऐसी छाई। 
मस्ती में खूब झूमने के बाद से ही, 
बेदम हो पड़े है कराहते हुए चारपाई। 
चिल्ला रही है खूब अब उनकी लुगाई, 
तुम्हें काहे को बुढ़ापे में जवानी छाई। 

होली के हुल्लड़ में गम सारे ही भूल गये,  
बड़े-बुजुर्ग भी होली खेलन पर तूल गये।
ताल से ताल मिले ओ मेरे बबुआ तो, गाकर,
जीवन के सारे दुःखों पर देखो डाल धूल गए।
होली के उमंग में उसूल भी अपने सारे भूल गये,  
बच्चों के रंग में वो रंगकर कूप्पा होकर फूल गए।
    

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