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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



सत्य हूँ मैं, अस्तित्व हूँ मैं!


समितिंजय शुक्ल


         

सत्य हूँ मैं, अस्तित्व हूँ मैं !
असंख्यों असत दबाए हुए 
छोर अनगिनत बिना मिलाए हुए
रचाए हुए चन्द्रमा की कलाएं
बचाए हुए करोड़ों सूरज की लालिमाएं
हर घट में घटित हूँ मैं, 
सत्य हूँ मैं, अस्तित्व हूँ !!

स्वप्न हो मेरा संसार भले
कला हो मेरा विस्तार भले
सौन्दर्य छलावा ही क्यों ना लगे
प्रेम भुलावा ही क्यों ना दिखे
जन जीवन जुगाए बैठा हूँ मैं!
सत्य हूँ मैं, अस्तित्व हूँ मैं! 

    

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