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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



' बेटी ' को समर्पित मेरी यह रचना -
" बेटी के जनम पर "


रवि रश्मि ' अनुभूति '


         

बेटी और बेटे में नहीं कोई भी फ़र्क है 
जिस घर में है बेटी ,वह घर स्वर्ग है 
बेटी तो घर की आन - बान  होती है 
सारे कुल - जहान की शान होती है l 
किलकारी बेटी की बड़ी मोहक होती है 
सच , सबका ही मन वह हल्का करती है 
छमक - ठुमक जब बिटिया चलती है 
माँ हर पल दम तो , उसी का ही भरती है l 
लख़्ते जिगर और नूर - ए - नज़र बेटी है 
उसमें उज्ज्वल दुनिया माँ ने देखी है 
वेदों - रिचाओं में भी समायी बेटी है 
सीता - सावित्री ,दुर्गा ,लक्ष्मी , इंदिरा बेटी है l 
सौभाग्यवती माँ है , जिसने जाई बेटी है 
कितने ही भाग्य अपने साथ वह लाई है 
बेटी ने ही रोशनी कुल में उपजाई है 
बेटी अपनी है वह , नहीं होती परायी है  l 
बेटी में तो बसता सारा ही जहान है  
बेटी दो कुलों का मान है , सम्मान है 
बेटों से ज़्यादा बेटी हर जगह पाती मान है 
माँ - बाप के अधरों पर रहता , बेटी का गान है l 
याद रखिए , बेटी घर के आँगन की तुलसी है 
देख - देख बेटी को माँ बहुत ही हुलसी है 
जो भी घर के आँगन की तुलसी को जलाता है 
उस माँ - बाप का घर नरक हो जाता है l 
इसलिए बेटी के जनम पर खुद को न कोसिए 
हुई कन्या तो खुद के भाग्य का सोचिए 
बेटी हो तो खिसियाने हो न खंभा नोचिए 
बेटी हो तो बेटे की बहन के लिये , नारी शक्ति की जय बोलिए l  
    

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