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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



ठगी जाती हूँ


रश्मि सिंह


         

आकर्षित करती हैं
तुम्हारी "लछेदर" बातें
और मैं ठगी जाती हूँ
हरबार 
मान लेती हूँ 
प्रेम अनुरोध तुम्हारा
और फिर से तब ठगी जाती हूँ
जब तुम चले जाते हो
और फिर से रह जाता है
एक बार ..   
साथ दीवारों का
जिससे "गूँजती" हुई आती है
कुछ "यादें"
जिनमें छुपा होता है 
बस तुम्हारा "प्रेम अनुरोध"
और एक बार मैं फिर ठगी जाती हूँ
यादों के भवर से 
जहाँ होता है बस इंतज़ार 
तुम्हारे लौट आने का
चाँद रातों में 
बातें किया करती हूँ तुम्हारे "अक्स" से
और फिर से ठगी जाती हूँ "मैं"
जब टूट कर गिरता है वो तारा
जिसमें नजर आते हो तुम
तभी ख़ामोश हो जाती है मेरी नजरें
और फिर से ठगी जाती हूँ "मैं"
उस कभी न खत्म होने वाले 
प्यार से जो मेरे हिस्से 
"रच" गए थे तुम!!


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