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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



फूल बन जाऊंगा


राजेश कुमार श्रीवास्तव


 

मैं कली हूँ / मैं जानता हूँ -
जिस दिन मैं फूल बन जाऊंगा / 
कइयों के आँखों में चढ़ जाऊंगा /
मुझे जुदा करके मेरी ही टहनियों से-
किसी माले में गूँथ दिया जाएगा /
या फिर किसी गुलदस्ते में पड़कर-
टेबल की शोभा बढ़ाऊंगा /
यदि सौभाग्यशाली रहा तो -
महापुरुषों या देव् प्रतिमाओं पर -
नहीं तो शवों या कब्रों पर जगह पाउँगा /
फिर कुछ ही पलों में कुम्हलाने लगेगी -
मेरी कोमल , रंगीन पंखुडिया / 
तब सुगंध भी न बिखेर पाउँगा / 
अगले दिन फेंक दिया जाएगा मुझे -
किसी कूड़ेदान में /
या फिर नाले में बहा दिया जाऊंगा /
इस तरह कलि से फूल बनते ही -
अपना अस्तित्व गवाऊंगा  /
फिर भी मुझे खिलना है /
कलि से फूल बनना है /
इंतज़ार में है तितलियाँ /
मडरा रहे है भौरे /
चूसने  को पराग -
तैयार बैठी है मधुमख्खियाँ /
इन्हें निराश तो नहीं कर पाउँगा /
खोलूंगा अपनी पंखुड़ियां /
बिखेरूँगा पराग /
इंतज़ार में है माली /
जानने को -
अपने मेहनत का परिणाम /
उसका विश्वास नहीं डिगाऊँगा /
मैं आज कली हूँ /
कल सुबह ही -
एक फूल बन जाऊंगा / 


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