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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



शब्द


पूनम भार्गव


   

खोद कर निकालना चाहती हॅॅू तुमको
उन कब्रों से जिनमें महान शब्द
साथ दफ्न हैं उन लोगों के 
जिन्होंने कहा कुछ
और हमने समझा कुछ

गंगा के तल में धुॅधलका बढ. गया है
जम गई कीचड. हमारे उन
प्रतिमानों की जो
समय-समय पर परिष्कृृत होने की
माॅग भी नहीं कर पाए
और बहा दिये गये
शब्द फिर से खो गये

ब्रहमाण्ड में 
चक्कर लगा रहे
उन शब्दों को जिनका विन्यास
सम्भवतः मनुष्य को
एक श्रेष्ठ युग देता 
या वो एक श्रेष्ठ युग्म के समकक्ष है
उन्हें पकड.ना है

हाॅ सुना है कुछ शब्द पकड.े गये हैं
गिरफ्तार नहीं हो पाये
तथाकथित वेत्ताओं का 
भविष्य हवाओं में
आंधियों की नई पीढ.ी जो
जन्म देता


जन्म-मरण की निजता
शब्दों ने तो नहीं अपनाई
कठोर तपस्या की भाॅति
उनका आवरण
अभेद कैसे ......घ्
जानना चाहॅू
भेदना चाहॅू सही अर्थ उनके
तो
सुरक्षा अधिकारियों के 
बनाये नियमों का पालन
ये कैसी बाध्यता.....घ्

विलुप्त प्रायः शब्दों के अर्थ
आर्थिक विकास को समर्पित हैं
उनके शासकों ने
अनमोल ख.जानों की तरह
उन्हें छुपा दिया और
दीन होने की बारी हमारी थी

दीन होना नए शब्दविन्यास
का जागरण था
नई परिभाषा की गढ.नशैली
उनकी नई सहेली थी
जिसका दिया प्रलोभन
सरलीकरण का सिद्वान्त
और क्लिष्ट कर गया 

खोज बियाबान की ओर खदेड. दी गई
वेद, कुरान और बाईबिल से निकल
असंख्य शब्दों ने झपट्टा मारा
भाग कर शरण लेना
मजबूरी नहीं आवश्यकता हुई

दलदल
जलजलों
और प्रकृति का आंदोलन
भीतरघात के उन्नमूलन से
प्रेरित हुआ
खोज की अभिलाषा ने
फिर से उस पहले
गर्भ में प्रविष्ट होने की
धारणा को सम्बल दिया

आदि और अंत के अनुबन्ध में
सम्मिलित पहला शब्द
जो केवल एक नाद से उपजा था
उस साक्षात्कार का साक्षी होना है

मूल शब्द का 
भाषा का और....
उसके अर्थ का अर्थ
फिर से गढ.ना है
और......
एक अधिपति की स्थापना
और......
एक उद्देश्य
के लिये
सारे शब्द तुम विलीन हो जाओ    !!!

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