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वर्ष: 2, अंक 32, मार्च(प्रथम), 2018



पन्ना


पूनम भार्गव


   

कचरे की टोकरी में
कुछ पन्नों का ढेर था
शायद
रद्दी हुआ जज्बात था
संजो कर खोया 
कोई ख़्वाब था

शायद उसमें 
प्रेम कहानी का अंश हो
उसमें विरह लिख दिया गया हो
किसी अनुमान से घबरा गया हो
फट कर
रद्दी की टोकरी में आ गया हो

शायद किसी का 
माफ़ीनामा था 
जो 
अहम के वहम में 
लिपट गया था
मुमकिन है
दम्भ में फाड़ा गया हो.............

शायद
लिखे गये झूठ का पिटारा था
सच छुपाने में नकारा था
क.लम से आँसू रिस गये हों
शब्द धुंधले पड़ गये हों


हो सकता है
वो पन्ना
प्रार्थना के क्षणों का साक्षी हो
देवता में आदमी देख
सकुचा गया हो और......
स्वम् ही फट गया हो

लिखने और फटने के दरम्यां
अनेक सम्भावनाओं में लिपटा था
काश
वाक्या जो पन्नों पर लिख जाता
सरकते दिनों के साथ
इतिहास में भी दर्ज हो जाता
पर अब वो
कलम, जज्बात और फैली स्याही में
ठुकराये जाने के दर्द से
लबरेज. था,

अफ.सोस
सारी शुद्व सम्भावनाओं को धकेल
वो हथेलियों में तुड़मुड़ गया था
कचरे से होता हुआ
जल गया था 
या 
गल गया था

वो पन्ना जो पेड़ की शाखों से चला
इन्सान के इरादों से छला
धुआँ हुआ 
राख हुआ

हाँ

वही पन्ना
जिसे
आवाजों की भीड़ में 
सम्वाद की तलाश थी !


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